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बुलडोज़र चला, वादे कुचले गए: दिल्ली की झुग्गियों से बेघर हुए 27 हज़ार लोग

दिल्ली: ‘मैं बांग्लादेशी नहीं, UP के प्रतापगढ़ जिले से हूं। UP वालों को क्यों हटाया जा रहा है। चुनाव से पहले BJP ने वादा किया था कि जहां झुग्गी है, वहीं मकान देंगे। हमें भी उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने झुग्गी की जगह मकान देने के बजाय पूरा मैदान बना दिया। BJP को वोट देना हमारी सबसे बड़ी गलती थी।’ दिल्ली के भूमिहीन कैंप में जन्म से रह रहीं सुनीता का घर 5 जुलाई को कब्जा बताकर तोड़ दिया गया। राशन कार्ड नहीं है, इसलिए मकान भी नहीं मिला। पूरा परिवार सड़क पर आ गया। बीते 5 महीनों में दिल्ली में 8 जगहों से झुग्गियां हटाई गईं और करीब 9 एकड़ जमीन खाली कराई गई। इसमें करीब 27 हजार लोग विस्थापित हुए हैं। इनमें से बहुत से लोगों को अब तक दूसरा मकान नहीं मिला है। इसे लेकर सियासत तब तेज हो गई, जब दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने आरोप लगाया कि इन इलाकों में रहने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए हैं। आम आदमी पार्टी और पूर्वांचल कम्युनिटी ने सिरसा के बयान पर एतराज जताया। AAP का कहना है कि सिरसा ने UP-बिहार से आने वाले स्लम के गरीब लोगों को ‘रोहिंग्या-बांग्लादेशी’ कहकर अपमानित किया। इस बुलडोजर एक्शन का प्रभावित इलाकों के लोगों की जिंदगी पर क्या असर पड़ा है, BJP ने सत्ता में आने से पहले ‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ का वादा किया था उसका क्या हुआ, ये जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ग्राउंड पर पहुंची।

अगर जमीन सरकार की, तो क्या 70 साल से सो रही थी: दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाले लोगों का सटीक डेटा नहीं है। यहां पुनर्वास की निगरानी दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड यानी DUSIB करता है। बोर्ड की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, दिल्ली में 675 छोटे-बड़े स्लम हैं, जिनमें 3.5 लाख परिवार और करीब 30 लाख लोग रहते हैं। इन्हीं में से एक कालकाजी का भूमिहीन कैंप है। यहां 11 जून को पूरी बस्ती साफ कर दी गई। 3,480 परिवारों में से सिर्फ 1862 परिवारों को घर मिला। कालकाजी एक्सटेंशन की आशा किरण सोसाइटी में इन्हें घर दिया गया है। हालांकि, कैंप में रहने वाली मीना को वो भी नहीं मिला। वो नाश्ते का ठेला लगाती हैं। बुलडोजर कार्रवाई के बारे में पूछने पर बेहद गुस्से में नजर आईं। वे कहती हैं, ‘मैं यहीं पैदा हुई। मेरे बच्चे भी यहीं बड़े हुए। मेरे पास वोटर आईडी, पैन कार्ड और बिजली का बिल भी है। सब 2008 के रजिस्टर्ड हैं, लेकिन मकान के लिए राशन कार्ड मांग रहे हैं। 15 साल से दिल्ली में राशन कार्ड ही नहीं बन रहा, इसलिए सर्वे करने आई टीम को भी नहीं दिखा सकी। इसलिए मुझे मकान नहीं दिया गया।’ कार्रवाई के बारे में पूछने पर कहती हैं, ‘सिर्फ दो दिन पहले नोटिस मिला था। कैंप के लोग सुप्रीम कोर्ट से स्टे ऑर्डर लेने गए थे और फैसला आना था। प्रशासन तो झुग्गी तोड़ने के लिए इतना बेचैन था कि 11 जून की सुबह होने का भी इंतजार नहीं कर सका। आधी रात को 3 बजे बुलडोजर लगा दिया।’ ‘घरों में घुसकर हमें बाहर निकालने लगे। अगर सरकार ऐसा करेगी तो गरीब आदमी कहां जाएगा। अगर ये जमीन सरकार की थी तो क्या 70 साल से सो रहे थे।’

BJP का नारा था- जहां झुग्गी, वहां मकान:  मीना आगे कहती हैं, ‘चुनाव था, तब हर पार्टी के नेता यहां आकर बोलते थे कि तुम्हें मकान देंगे। BJP का नारा था- जहां झुग्गी, वहां मकान। वादा किया था किसी को बेघर नहीं करेंगे। अब छोटी-छोटी वजहों से मकान नहीं दिया। BJP और CM रेखा गुप्ता ने झूठ बोला। जो नेता बोल रहे हैं कि बांग्लादेशियों को हटाया जा रहा है तो क्या उनके पास कोई लिस्ट है।’ ‘मैं UP के प्रतापगढ़ जिले से हूं। बांग्लादेशी नहीं हूं। UP वालों को क्यों हटाया जा रहा है। आतिशी यहां आई थीं। उन्होंने लोगों की मदद की, लेकिन वो इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकतीं। उनको पुलिस जबरदस्ती वैन में बैठाकर ले गई।’ मीना कहती हैं, ‘BJP को वोट देना हमारी गलती थी। हमें नहीं पता था कि हमारे बच्चों के सिर से छत छीन लेगी, वरना कभी वोट नहीं देते। हमें उम्मीद थी कि वो झुग्गी की जगह मकान देंगे। उन्होंने झुग्गी की जगह पूरा मैदान बना दिया।’

 मकान मिलने के लिए राशन कार्ड होना जरूरी नहीं:  भूमिहीन कैंप में रहने वाले हरिशंकर झुग्गियों के मालिकाना हक के लिए सुप्रीम कोर्ट गए। वे बताते हैं, ‘सर्वे 2019 में शुरू हुआ था। जो भी फ्लैट मिले हैं, उनकी नींव कांग्रेस के वक्त में डाली गई थी। इसमें से सिर्फ 1862 को ही मकान मिले हैं।’ ‘भूमिहीन कैंप में 1029 लोगों को अपात्र घोषित कर दिया गया। 100 से ज्यादा लोगों को सर्वे में शामिल ही नहीं किया गया। जैसे कहा गया कि 2015 से पहले का एक राशन कार्ड चाहिए।’ ‘सरकारी दस्तावेजों में लिखा है कि मकान मिलने के लिए राशन कार्ड होना जरूरी नहीं। फिर भी जिनके पास राशन कार्ड नहीं, उन्हें मकान नहीं दिया गया।’ ‘सर्वे के समय बस्तियों में सिर्फ वॉलंटियर आते थे। 2019 DUSIB या DDA का कोई ऑफिशियल व्यक्ति नहीं आया, जबकि पॉलिसी के मुताबिक, उनके अधिकारियों को झुग्गियों का सर्वे करना था।’ हरिशंकर कहते हैं, ‘कुछ लोगों को तो मकान देने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि 2019 लोकसभा चुनाव की वोटर लिस्ट में उनका नाम नहीं था। कुल मिलाकर सरकार अपने फ्लैट बचाना चाहती है। वहीं बिचौलिए सरकारी मकान के बदले पैसे मांग रहे हैं।’

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