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मगफिरत का पैगाम देता है रमजान का दूसरा अशरा: कारी बिलाल

– पेश इमाम ने रोज़दारों को इबादत, तौबा व अल्लाह से माफी मांगने की दी नसीहत
– पेश इमाम कारी बिलाल नूरी।
फतेहपुर। पवित्र रमज़ान माह के दूसरे अशरे (मग़फिरत का अशरा) के शुरू होते ही मुस्लिम समाज में इबादत और तौबा की भावना और भी बढ़ जाती है। खागा तहसील क्षेत्र के सुल्तानपुर घोष गांव के पेश इमाम क़ारी बिलाल नूरी ने रमज़ान के दूसरे अशरे की अहमियत बताते हुए कहा कि यह अशरा अल्लाह की मग़फिरत यानी माफी हासिल करने का बेहतरीन मौका होता है। क़ारी बिलाल नूरी ने बताया कि रमज़ान का महीना तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत (अल्लाह की दया) का होता है, दूसरा अशरा मग़फिरत (माफी) का और तीसरा अशरा जहन्नम से निजात का होता है। उन्होंने कहा कि दूसरे अशरे में मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा तौबा, इस्तिग़फार और इबादत करनी चाहिए ताकि अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ कर दे। उन्होंने कहा कि रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह इंसान को सब्र, संयम और अल्लाह की इबादत की ओर प्रेरित करता है। रमज़ान के दिनों में नमाज़, कुरआन की तिलावत, ज़कात और सदक़ा देने से समाज में भाईचारा और इंसानियत का संदेश फैलता है। क़ारी बिलाल नूरी ने रोज़ेदारों से अपील करते हुए कहा कि रमज़ान के दूसरे अशरे में दिल से तौबा करें, अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से माफी मांगें और ज्यादा से ज्यादा नेक काम करें। उन्होंने कहा कि अल्लाह अपने बंदों की सच्ची तौबा को बहुत पसंद करता है और इस पाक महीने में की गई इबादत का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। उन्होंने अंत में कहा कि रमज़ान का महीना इंसान को अपनी गलतियों से सीख लेकर नेक रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि इस मुबारक महीने के हर पल को इबादत, दुआ और इंसानियत की सेवा में बिताए।

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