न्यूज़ वाणी ब्यूरो | महोबा
महोबा। शारदीय नवरात्रि की नवमी पर महोबा शहर में भक्ति और आस्था का माहौल देखने को मिला। सुबह से ही देवी मंदिरों और पूजा पंडालों में कन्या पूजन, कन्या भोज, हवन और भंडारों का आयोजन शुरू हो गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। इस दौरान कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया गया और भोजन कराकर आशीर्वाद लिया गया।
हालांकि, नवरात्रि के इस पावन अवसर पर समाज में बेटियों के प्रति भेदभाव की मानसिकता पर भी सवाल खड़े हुए। एक ओर कन्याओं को देवी मानकर उनकी पूजा की गई, वहीं दूसरी ओर यह विचारणीय है कि बेटियों के जन्म पर मायूसी जताने वाली सोच को समाज से पूरी तरह खत्म क्यों नहीं किया जा सका है।
देवी मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
नवमी के अवसर पर महोबा के बड़ी चंद्रिका माता मंदिर, छोटी चंद्रिका माता मंदिर, काली माता मंदिर, चामुंडा माता मंदिर, चकौटा देवी, विंध्यवासिनी मंदिर और शीतला देवी मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ रही। मंदिरों में पूजा-अर्चना, आरती और हवन के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। घंटा-घड़ियालों की ध्वनि और मां दुर्गा के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा।
विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं ने कन्याओं को आमंत्रित कर उनका विधि-विधान से पूजन किया। इसके बाद कन्या भोज कराया गया। शहर के कई इलाकों में भंडारों का आयोजन भी हुआ, जिसमें लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।
कन्या भोज के लिए कन्याओं की तलाश, समाज को आत्ममंथन की जरूरत
नवरात्रि में कन्या पूजन की परंपरा भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखती है। इस दौरान छोटी बच्चियों को मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका सम्मान किया जाता है। लेकिन इस परंपरा के साथ समाज की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
यह विडंबना है कि कुछ परिवारों में बेटी के जन्म पर खुशी के बजाय चिंता जताई जाती है, जबकि धार्मिक अवसरों पर कन्या भोज कराने के लिए कन्याओं को तलाशा जाता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब बेटियों को देवी का स्वरूप माना जाता है, तो उन्हें रोजमर्रा के जीवन में बराबरी का दर्जा देने में संकोच क्यों किया जाता है?
हवन-पूजन और भंडारों के साथ नवमी का समापन
नवमी के अवसर पर विभिन्न देवी पंडालों में स्थापित प्रतिमाओं की विधि-विधान से पूजा की गई। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच हवन-पूजन कर श्रद्धालुओं ने परिवार और समाज की खुशहाली की प्रार्थना की। कई स्थानों पर शाम तक धार्मिक कार्यक्रम और भंडारे चलते रहे।
श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हुए पूजा-अर्चना की और कन्याओं को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
नौ दिनों की पूजा के साथ सालभर बेटियों का सम्मान भी जरूरी
नवरात्रि का संदेश केवल नौ दिनों तक कन्या पूजन करने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ बेटियों को जीवन के हर क्षेत्र में सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और समान अवसर देना भी है।
बेटियों के जन्म पर खुशी मनाना, उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाना, उनके सपनों को पूरा करने में सहयोग देना और उन्हें समान अधिकार देना ही सच्चे अर्थों में नारी शक्ति का सम्मान है। यदि समाज कन्याओं में देवी का स्वरूप देखता है, तो यह सम्मान घर और समाज में भी दिखाई देना चाहिए। यही नवरात्रि की आराधना को सार्थक बनाने का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
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