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इच्छा मृत्यु पर बड़ा सवाल: हरीश के मामले से उठी बहस—भारत में कानून क्यों अटका, दुनिया क्या कहती है?”

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया. जिसने जीवन की गरिमा, पीड़ा और ‘राइट टू डाई विथ डिग्निटी’ पर फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया. हरीश पिछले 13 साल से 100% विकलांगता और परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं तथा उनके ठीक होने की संभावना न के बराबर है. इस केस में चार विशेषज्ञ डॉक्टरों की रिपोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि हरीश की बीमारी में किसी भी तरह की रिकवरी की संभावना लगभग शून्य है. इस स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की प्रक्रिया के अगले चरण को शुरू करने का निर्णय लिया.जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने एम्स दिल्ली के निदेशक को निर्देश दिया कि वे एक सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड गठित करें. याचिका हरीश के पिता अशोक राणा की ओर से दायर की गई थी, जो अपने बेटे को वर्षों से असहनीय अवस्था में देखते आ रहे हैं. प्राथमिक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में दर्ज था कि हरीश बिस्तर पर ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब के सहारे सांस ले रहे हैं, गैस्ट्रोस्टॉमी के माध्यम से भोजन दिया जा रहा है और उनके पूरे शरीर पर बेडसोर हो गए हैं. अदालत ने रिपोर्ट पढ़ते हुए टिप्पणी की कि यह स्थिति अत्यंत दयनीय है और इतनी लंबी अवधि में भी किसी सुधार के संकेत न होना दुखद है.सुनवाई के अंत में पीठ ने स्पष्ट कहा कि अदालत अब हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती. कोर्ट ने कहा, ‘हम उसे इस हालत में जीने नहीं दे सकते, यह तय है. याचिकाकर्ता की वकील ने दलील दी कि चूंकि सीएमओ पहले बोर्ड में शामिल थे, इसलिए दूसरा बोर्ड आवश्यक नहीं है, परंतु अदालत ने प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य बताया. एम्स से नई रिपोर्ट 17 दिसंबर तक मांगी गई है और अगली सुनवाई 18 सितंबर होगी.हरीश साल 2013 में पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे, जब वे अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए. कई अस्पतालों में इलाज के बावजूद वे कोमा जैसी हालत से कभी बाहर नहीं आ पाए. जब दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके मामले में प्राथमिक बोर्ड को भेजने से इनकार कर दिया, तो पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उनका कहना है कि जिस अवस्था में उनका बेटा है, वह उसकी गरिमा का हनन है और हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया.

भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर बहस 21वीं सदी के शुरु हुई. साल 2006 में विधि आयोग की 196वीं रिपोर्ट सामने आई, जिसमें असाध्य रूप से बीमार मरीजों के उपचार और डॉक्टरों की कानूनी सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई. इसी रिपोर्ट के माध्यम से पहली बार इच्छा मृत्यु और सम्मानपूर्वक मृत्यु के अधिकार को कानूनी और सामाजिक विमर्श में स्पष्ट रूप से रखा गया.

इच्छा मृत्यु पर देशव्यापी बहस को वास्तविक दिशा अरुणा शानबाग केस से मिली. 1973 में हुए एक हमले के बाद अरुणा शानबाग दशकों तक वेजिटेटिव अवस्था में रहीं. उनकी ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में फैसला सुनाते हुए सख्त शर्तों के तहत निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को अनुमति दी. यह पहली बार था जब अदालत ने विशेष परिस्थितियों में जीवन रक्षक प्रणालियां हटाने को कानूनी रूप से स्वीकार किया, हालांकि इसे न्यायिक निगरानी से जोड़कर रखा गया.

अरुणा शानबाग फैसले के बाद विधि आयोग ने 2012 में अपनी 241वीं रिपोर्ट जारी की. इसमें निष्क्रिय इच्छा मृत्यु से जुड़े सुझावों को दोहराया गया और मरीजों, उनके परिजनों तथा डॉक्टरों के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट कानून और दिशानिर्देश बनाने की आवश्यकता बताई गई.

2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को वैध ठहराया और लाइलाज मरीजों की ‘लिविंग विल’ को कानूनी मान्यता दी. अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए विस्तृत नियम तय किए, ताकि किसी भी तरह के दुरुपयोग को रोका जा सके और व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार मिल सके.

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