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दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी अनुमति

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी है। अदालत ने कहा कि एक नाबालिग से बच्चे को जन्म देने और उसकी परवरिश की जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने इस मामले को पीड़िता के सम्मानजनक जीवन और मानवाधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय माना।

पीड़िता और उसकी मां ने गर्भावस्था समाप्त करने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था। उन्हें आशंका थी कि गर्भावस्था जारी रहने से नाबालिग को गंभीर मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अदालत ने गर्भसमापन की अनुमति प्रदान की।

गर्भसमापन को लेकर क्या है कानूनी प्रावधान?

भारत में गर्भसमापन से संबंधित कानून के तहत सामान्यतः 20 सप्ताह तक गर्भसमापन की अनुमति है। कुछ निर्धारित श्रेणियों में, जिनमें दुष्कर्म पीड़िताएं भी शामिल हैं, विशेष शर्तों के अधीन यह सीमा 24 सप्ताह तक है। 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था के मामलों में कानूनी प्रावधानों और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाता है। इस मामले में अदालत ने 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी।

अदालत ने दिए तीन महत्वपूर्ण निर्देश

1. भ्रूण के ऊतकों को सुरक्षित रखने का आदेश

पीड़िता का इलाज लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में चल रहा है। अदालत ने डॉक्टरों को भ्रूण के ऊतकों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया, ताकि आपराधिक मामले की जांच के दौरान आवश्यकता पड़ने पर डीएनए परीक्षण किया जा सके।

2. जीवित जन्म की स्थिति में चिकित्सा सहायता

अदालत ने निर्देश दिया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया के दौरान यदि बच्चा जीवित पैदा होता है, तो अस्पताल प्रशासन उसकी हरसंभव चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करे। उपचार का पूरा खर्च राज्य सरकार को वहन करने का निर्देश भी दिया गया।

3. परिवार की इच्छा पर गोद देने का विकल्प

अदालत ने कहा कि पीड़िता और उसके परिवार की इच्छा होने पर निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चे को गोद देने का विकल्प अपनाया जा सकता है। साथ ही, नाबालिग पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने के निर्देश दिए गए।

31 सप्ताह की गर्भावस्था में विशेष चिकित्सा देखभाल जरूरी

गर्भावस्था के 31वें सप्ताह तक भ्रूण काफी विकसित हो चुका होता है। ऐसे में गर्भसमापन की प्रक्रिया के दौरान जीवित जन्म की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में नवजात को तत्काल चिकित्सा सहायता और जरूरत पड़ने पर नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में देखभाल की आवश्यकता हो सकती है।

इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अस्पताल को पहले से आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। यह निर्देश संभावित स्थिति के लिए एहतियाती व्यवस्था है, न कि इस बात की पुष्टि कि जीवित जन्म अवश्य होगा।

इस मामले में अदालत के निर्देशों का उद्देश्य पीड़िता के अधिकारों, उसकी निजता और संभावित चिकित्सकीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक कदम सुनिश्चित करना है।

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