देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की संभावना को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दावा किया जा रहा है कि यदि सभी राज्य इसके लिए तैयार हो जाते हैं, तो वर्ष 2029 में पूरे देश में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं। इस व्यवस्था से सरकारी खर्च में बड़ी बचत होने की उम्मीद जताई जा रही है।
अनुमान के मुताबिक, एक साथ चुनाव कराने से करीब 7 लाख करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है। हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए राज्यों की सहमति, संवैधानिक प्रावधानों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कई चुनौतियों पर विचार करना होगा।
वहीं, पूर्व चुनाव आयुक्त ने इतनी बड़ी बचत के दावे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या यह कोई जादू की छड़ी है, जिससे इतनी आसानी से सब कुछ संभव हो जाएगा? इस टिप्पणी ने एक साथ चुनाव कराने की योजना और उससे होने वाली संभावित बचत को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।
एक देश, एक चुनाव की व्यवस्था लागू होने पर चुनावी खर्च, प्रशासनिक संसाधनों और सुरक्षा बलों की तैनाती में बदलाव संभव है। हालांकि, 2029 में इसे लागू किया जाएगा या नहीं, यह राज्यों की तैयारी और संबंधित कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
एक देश, एक चुनाव को लेकर क्या है पूरी योजना?
एक देश, एक चुनाव का उद्देश्य लोकसभा और राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक ही समय के आसपास कराना है। इसके समर्थकों का मानना है कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी मशीनरी पर दबाव पड़ता है और विकास कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है। वहीं, इसके विरोध में कई राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों ने व्यावहारिक चुनौतियों को लेकर सवाल उठाए हैं।
बार-बार चुनाव कराने से कैसे बढ़ता है खर्च?
देश में अलग-अलग समय पर लोकसभा, विधानसभा और उपचुनाव होने के कारण चुनाव आयोग, प्रशासन और सुरक्षा बलों को बार-बार व्यवस्था करनी पड़ती है। चुनाव के दौरान कर्मचारियों की तैनाती, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, ईवीएम और वीवीपैट मशीनों के इस्तेमाल तथा सुरक्षा इंतजामों पर खर्च होता है। एक साथ चुनाव कराने के समर्थकों का तर्क है कि इससे इन व्यवस्थाओं को बार-बार दोहराने की जरूरत कम हो सकती है।
हालांकि, एक साथ चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की खरीद, भंडारण, परिवहन और सुरक्षा पर भी खर्च करना होगा। इसलिए कुल बचत कितनी होगी, इसका आकलन सभी संबंधित खर्चों को ध्यान में रखकर करना जरूरी है।
राज्यों की सहमति और संवैधानिक बदलाव बड़ी चुनौती
देशभर में एक साथ चुनाव कराने के लिए लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल में तालमेल बैठाना होगा। यदि किसी राज्य की सरकार बीच में गिर जाती है या किसी सदन का कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव की स्थिति बनती है, तो उस समय चुनाव कैसे कराए जाएंगे, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।
इसके अलावा, प्रस्ताव को लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधनों और कानूनी प्रक्रियाओं पर आगे बढ़ना होगा। संसद की भूमिका के साथ-साथ राज्यों से जुड़े संवैधानिक और राजनीतिक पहलुओं पर भी विचार करना पड़ेगा।
क्या 2029 में लागू हो सकती है व्यवस्था?
2029 में एक साथ चुनाव कराने की संभावना इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्ताव को लागू करने की कानूनी प्रक्रिया कितनी आगे बढ़ती है और चुनावी व्यवस्था से जुड़ी तैयारियां समय पर पूरी होती हैं या नहीं। इसमें चुनाव आयोग की तैयारी, मशीनों की उपलब्धता, कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की तैनाती जैसे पहलू भी अहम होंगे।
फिलहाल, 7 लाख करोड़ रुपये की बचत का दावा चर्चा का प्रमुख विषय है। इस राशि को निश्चित बचत मानने के बजाय एक अनुमानित दावे के रूप में देखना चाहिए। वास्तविक बचत का पता विस्तृत वित्तीय आकलन और लागू होने वाली व्यवस्था के स्वरूप से ही चल सकेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या देश 2029 तक एक साथ चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार हो पाएगा, और क्या इससे होने वाली बचत वास्तव में अनुमान के अनुरूप होगी?
News Wani
