फतेहपुर उत्तम उद्योग व्यापार मंडल उत्तर प्रदेश के तत्वाधान में रामलीला मैदान ज्वालागंज में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा में ‘राम वनवास’ के मार्मिक प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा व्यास श्रद्धेय चंदन कृष्ण जी महाराज ने प्रभु श्रीराम के अयोध्या त्याग और वन गमन की कथा सुनाते हुए कहा कि राम वनवास पितृ आज्ञा पालन और धर्म की रक्षा का सर्वोच्च आदर्श है। कथा सुनते समय पंडाल में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
कथा के दौरान बताया गया कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, तभी दासी मंथरा के उकसाने पर रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए—पहले वरदान में भरत को राज्य और दूसरे वरदान में राम को 14 वर्ष का वनवास।
कथा व्यास ने कहा कि जैसे ही श्रीराम ने देखा कि पिता के वचनों पर संकट आ गया है, उन्होंने बिना किसी विलंब के राजसी सुखों का त्याग कर वन गमन स्वीकार कर लिया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि धर्म और वचन की रक्षा के लिए बड़े से बड़ा पद भी त्याग देना ही सच्ची मर्यादा और मानवता है।
कथा में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के वन प्रस्थान का सजीव चित्रण किया गया। अयोध्यावासियों का विलाप और राजा दशरथ की व्याकुलता का वर्णन सुनकर श्रोता भावुक हो उठे। कथा व्यास ने बताया कि राम का वनवास केवल दंड नहीं, बल्कि राक्षसों के संहार तथा शबरी और केवट जैसे भक्तों के उद्धार की ईश्वरीय योजना थी।
व्यास पीठ से संदेश दिया गया कि आज के भौतिकवादी युग में जहां संपत्ति के लिए भाई-भाई में विवाद हो जाता है, वहीं राम और भरत का चरित्र त्याग, प्रेम और मर्यादा का प्रतीक है। माता सीता का राम के साथ वन जाना पतिव्रत धर्म की पराकाष्ठा का उदाहरण है।
इस दौरान ‘वन चले अवध के राम’ और ‘राम वनवास’ जैसे भजनों पर श्रद्धालु भाव-विभोर होकर झूम उठे। कार्यक्रम में महानंद रामलीला कमेटी के महामंत्री रामजी श्रीवास्तव एवं रेडक्रॉस सोसायटी के चेयरमैन अनुराग श्रीवास्तव ने कथा व्यास चंदन कृष्ण जी महाराज को प्रतीक चिन्ह और शॉल भेंट कर सम्मानित किया।
कथा के अंत में संयोजक कृष्ण कुमार तिवारी ने सपरिवार महाआरती की और सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया। इस अवसर पर धनंजय मिश्रा, अनिल महाजन, जय किशन, श्रवण दीक्षित, गंगाशरण करवरिया, अतुल कसेरा, गंगासागर, सोनू शुक्ला, सनी, शिवप्रसाद मामा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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