पेरिस। फ्रांस में महंगाई, कमजोर अर्थव्यवस्था और सरकारी सुविधाओं में कटौती को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसा और लूटपाट में बदल गया। हालात को देखते हुए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तोड़फोड़ और लूटपाट करने वालों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। वहीं, प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने हालात पर काबू पाने के लिए कुछ इलाकों में कर्फ्यू लगाने और जरूरत पड़ने पर आपातकाल लागू करने की संभावना जताई है।
हिंसक प्रदर्शन में दुकानों और सरकारी संपत्तियों को नुकसान
फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में कुछ नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और पुलिस वाहनों को निशाना बनाया। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 1,500 दुकानों और कारोबारों में लूटपाट या तोड़फोड़ की गई।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल करना पड़ा। गृह मंत्रालय के अनुसार, हिंसा के दौरान लगभग 1,000 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें सात की हालत गंभीर बताई गई। हिंसा के कारण ऐतिहासिक इमारतों को भी नुकसान पहुंचा। लिमोज शहर में 143 साल पुराने टाउन हॉल में आग लगाए जाने की घटना ने चिंता बढ़ा दी।
सरकार ने कर्फ्यू और आपातकाल के विकल्प खुले रखे
हिंसा के बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सरकार की आपात बैठक बुलाई। सरकार का जोर कानून-व्यवस्था बहाल करने और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर है। हालात को देखते हुए कुछ संवेदनशील इलाकों में आंशिक कर्फ्यू लगाने की तैयारी की जा रही है। प्रधानमंत्री ने संकेत दिया है कि यदि स्थिति और बिगड़ती है तो आपातकाल लागू करने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि हिंसा पर लगाम लगाने के साथ-साथ जनता की नाराजगी को भी दूर किया जाए। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख चिंताओं में महंगाई, सरकारी सेवाओं में कमी और आर्थिक दबाव शामिल हैं।
राष्ट्रपति मैक्रों के सामने बढ़ी राजनीतिक चुनौती
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए मौजूदा संकट राजनीतिक रूप से भी मुश्किल साबित हो रहा है। उनकी सरकार को आर्थिक नीतियों, बढ़ते सरकारी कर्ज और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। एक सर्वे के हवाले से सामने आए आंकड़ों में केवल 15 प्रतिशत लोगों ने मैक्रों के प्रति सकारात्मक राय जताई, जबकि 82 प्रतिशत लोगों ने उनके कामकाज पर असंतोष जाहिर किया।
हालांकि, इन आंकड़ों के बीच सर्वे की तारीख और एजेंसी की पुष्टि जरूरी है। फिर भी, जनता में बढ़ती नाराजगी और सड़कों पर हिंसा सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।
संसद में राजनीतिक मतभेद से सरकार की मुश्किलें बढ़ीं
फ्रांस की संसद में अलग-अलग राजनीतिक गुटों के बीच मतभेद के कारण कई अहम फैसलों पर सहमति बनाना कठिन हो रहा है। आर्थिक सुधारों, सरकारी खर्च और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर राजनीतिक खींचतान जारी है। ऐसे में सरकार के लिए एक साथ आर्थिक समस्याओं और कानून-व्यवस्था के संकट से निपटना आसान नहीं है।
अप्रैल 2027 में प्रस्तावित राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो रही हैं। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन और वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों जैसे नेताओं के लिए मौजूदा संकट अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को सामने रखने का अवसर बन सकता है।
बढ़ते कर्ज और महंगाई से जनता परेशान
फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर सरकारी कर्ज का दबाव बढ़ रहा है। सरकार पर खर्च नियंत्रित करने और वित्तीय स्थिति सुधारने का दबाव है, लेकिन सरकारी सुविधाओं या कल्याणकारी योजनाओं में कटौती से जनता की नाराजगी और बढ़ने की आशंका है।
मौजूदा हालात ने सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ हिंसा और लूटपाट पर नियंत्रण जरूरी है, तो दूसरी तरफ महंगाई, आर्थिक असुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना भी अहम है। आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति तय करेगी कि फ्रांस में हालात कितनी जल्दी सामान्य हो पाते हैं।
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