वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने से जुड़े प्रतिबंधात्मक कदम को फिलहाल रोक दिया है। इस फैसले से भारत को भी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है और रूस कच्चे तेल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है।
ट्रम्प ने शुक्रवार को इस फैसले से संबंधित आदेश पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने कहा कि फिलहाल प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने से अमेरिका के हितों को नुकसान हो सकता है। प्रस्तावित कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान था। इसकी चपेट में भारत और चीन समेत कई देश आ सकते थे।
रूस से तेल खरीदने पर भारत को मिल सकती है राहत
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है। अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45 प्रतिशत थी। भारत ने इस दौरान रूस से प्रतिदिन औसतन 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा था।
ऐसे में रूस से तेल खरीदने पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का फैसला भारत के लिए महंगा साबित हो सकता था। इससे भारतीय आयातकों की लागत बढ़ने के साथ पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी दबाव पड़ने की आशंका थी।
भारत का कहना रहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए वैश्विक बाजार की परिस्थितियों और तेल की उपलब्धता को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है।
रूस पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून फिलहाल ठंडे बस्ते में
रूस पर सख्त प्रतिबंध लगाने से जुड़े विधेयक को अमेरिकी संसद में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सदस्यों का समर्थन मिला था। इस प्रस्ताव का उद्देश्य रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई को सीमित करना था, ताकि यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए उसकी आर्थिक क्षमता पर दबाव बनाया जा सके।
हालांकि, ट्रम्प ने फिलहाल इस दिशा में सख्त कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया है। अमेरिकी सांसदों के एक वर्ग ने इस कदम की आलोचना की है। उनका मानना है कि प्रतिबंधों में ढील देने से रूस पर आर्थिक दबाव कम हो सकता है।
तेल की बढ़ती कीमतें भी फैसले की वजह
अमेरिका में तेल की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ रही है। रूस की तेल रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों और वैश्विक आपूर्ति में संभावित बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका भी वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चिंता का विषय है। यदि रूस से तेल की आपूर्ति घटती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं। ऐसे में पेट्रोल की कीमतों और महंगाई को नियंत्रित रखना ट्रम्प प्रशासन के लिए अहम माना जा रहा है।
रूस से डीजल खरीदने के मुद्दे पर भी विवाद
रूस के साथ ऊर्जा व्यापार को लेकर ट्रम्प प्रशासन का रुख चर्चा में है। खबरों के अनुसार, रूस से डीजल खरीदने और उसकी बिक्री पर लगी पाबंदियों में अप्रैल 2027 तक छूट देने के फैसले को लेकर भी विवाद हुआ है।
इस कदम से यूक्रेन और यूरोप के कुछ अधिकारियों ने नाराजगी जताई है। अमेरिकी संसद के कुछ सदस्यों ने भी रूस से डीजल खरीदने की छूट वापस लेने की मांग की है।
भारत और वैश्विक बाजार पर क्या होगा असर?
रूस पर सख्त प्रतिबंधों को फिलहाल रोकने से भारत को ऊर्जा आयात के मामले में राहत मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, अमेरिकी सरकार की आगे की नीतियों और रूस से होने वाली आपूर्ति पर निर्भर करेगा।
फिलहाल, भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की स्थिर आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रण में रखना है। यदि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।
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