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“यूरोप की लाइन दिल्ली में क्यों? Germany-Poland के बाद Spain के नेता भी जयशंकर से मिलने भारत क्यों पहुंचे”

स्पेन के साथ वार्ता में दोनों देशों ने लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुपक्षवाद और नियम आधारित व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई। वर्ष 2026 को भारत और स्पेन ने कूटनीतिक संबंधों की 70वीं वर्षगांठ और संस्कृति, पर्यटन तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दोहरे वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। बैठक के दौरान व्यापार, रक्षा उद्योग, एआई और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। एयरबस टाटा सी 295 परियोजना का उल्लेख करते हुए यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत अब रक्षा उत्पादन में साझेदारी का भरोसेमंद केंद्र बन रहा है।

इससे ठीक पहले पोलैंड के विदेश मंत्री के साथ हुई बातचीत ज्यादा तीखी रही। भारत ने साफ शब्दों में कहा कि उसे अपने साझेदारों से यह अपेक्षा है कि वह उसके पड़ोस में आतंकवाद को किसी भी रूप में बढ़ावा न दें। पोलैंड के साथ व्यापार, निवेश और रणनीतिक साझेदारी पर सहमति के बावजूद पाकिस्तान और रूस जैसे मुद्दों पर मतभेद भी खुलकर सामने आए। भारत ने यूरोपीय संघ द्वारा रूस से तेल व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंधों को चयनात्मक और अन्यायपूर्ण बताया। इन सबके बीच यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय नेताओं को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। साथ ही भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता भी होने जा रहा है।

देखा जाये तो यूरोप की यह बढ़ती दिलचस्पी संयोग नहीं बल्कि रणनीति है। एक समय था जब यूरोपीय राजधानियों में भारत को केवल एक बड़ा बाजार या विकासशील लोकतंत्र के रूप में देखा जाता था। आज वही यूरोप भारत को वैश्विक शक्ति संतुलन के अनिवार्य स्तंभ के रूप में देख रहा है। जर्मनी, पोलैंड और स्पेन के नेताओं की यात्राएं उसी बदले हुए नजरिये का प्रमाण हैं। सबसे पहले गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के प्रश्न पर नजर डालें। यह कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं होता बल्कि एक राजनीतिक संदेश होता है। जब किसी यूरोपीय नेता को यह सम्मान मिलता है तो दुनिया को यह संकेत जाता है कि भारत यूरोप के साथ अपने रिश्तों को केवल द्विपक्षीय नहीं बल्कि वैश्विक रणनीति के हिस्से के रूप में देखता है।

यूक्रेन युद्ध, रूस पर प्रतिबंध और एशिया प्रशांत में बदलते समीकरणों के बीच यूरोप को भारत जैसा संतुलित और आत्मनिर्भर साझेदार चाहिए। वहीं जर्मन चांसलर की भारत यात्रा ने यह साफ कर दिया कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को आपूर्ति श्रृंखला और औद्योगिक सहयोग का अहम केंद्र मान रही है। इसके बाद पोलैंड के उप प्रधानमंत्री की यात्रा ने यह दिखाया कि मध्य यूरोप भी भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को गहराई देना चाहता है। हालांकि भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद और चयनात्मक प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर वह समझौता नहीं करेगा। यह एक परिपक्व और आत्मविश्वासी विदेश नीति का संकेत है।

स्पेन के साथ बातचीत ने रिश्तों के सकारात्मक और रचनात्मक पहलू को उजागर किया। एआई, रक्षा उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा और सांस्कृतिक आदान प्रदान जैसे क्षेत्रों में सहयोग यह दर्शाता है कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि सह निर्माता और सह नवोन्मेषक बन चुका है। एयरबस टाटा परियोजना इस बदलाव का ठोस उदाहरण है, जहां भारत में निर्माण केवल रोजगार नहीं बल्कि रणनीतिक क्षमता भी पैदा कर रहा है। इन वार्ताओं से दुनिया को एक साफ संदेश गया है। भारत किसी खेमे का हिस्सा नहीं है लेकिन हर जिम्मेदार शक्ति का साझेदार है। वह आतंकवाद पर शून्य सहनशीलता चाहता है और वैश्विक नियमों की बात करता है लेकिन साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर कोई समझौता नहीं करता।

रूस से तेल खरीद पर भारत का रुख और यूरोप के सामने उसे स्पष्ट शब्दों में रखना इसी आत्मविश्वास का परिचायक है। भारत के लिए यह दौर इसलिए भी हितकारी है क्योंकि यूरोप खुद संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक स्वायत्तता जैसे मुद्दों पर उसे नए भरोसेमंद मित्र चाहिए। भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल बाजार और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था उसे स्वाभाविक विकल्प बनाती है। दूसरी ओर भारत को भी यूरोप से तकनीक, निवेश और वैश्विक मंचों पर समर्थन की जरूरत है।

आज की भारतीय विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वह संतुलन साधने की कला में माहिर हो गई है। अमेरिका के साथ साझेदारी, रूस के साथ संवाद और यूरोप के साथ गहराते रिश्ते यह दिखाते हैं कि भारत किसी एक ध्रुव में बंधा नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में विदेश नीति न तो रक्षात्मक रही है और न ही आक्रामक, बल्कि स्पष्ट और परिणामोन्मुख रही है। यूरोपीय नेताओं का लगातार भारत आना इसी सफलता की मुहर है। यह भारत की बढ़ती कूटनीतिक साख और उसकी रणनीतिक अपरिहार्यता को रेखांकित करता है। आने वाले समय में यह सहयोग केवल बैठकों और बयानों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि रक्षा उद्योग, एआई, ऊर्जा और वैश्विक शासन में ठोस परिणाम देगा।

जहां तक स्पेन के विदेश मंत्री के साथ जयशंकर की बैठक के दौरान भारतीय विदेश मंत्री के संबोधन की बात है तो आपको बता दें कि इस दौरान उन्होंने 18 जनवरी को कोरदोबा में हुई दुर्भाग्यपूर्ण रेल दुर्घटना में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त की और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। जयशंकर ने कहा कि भारत और स्पेन के बीच गर्मजोशी और मित्रतापूर्ण संबंध हैं जो साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुपक्षवाद और नियम आधारित व्यवस्था के प्रति सम्मान पर आधारित हैं। उच्च स्तरीय नियमित आदान प्रदान के साथ हमारा राजनीतिक संवाद लगातार मजबूत हुआ है। उन्होंने कहा कि आर्थिक साझेदारी हमारे संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

स्पेन यूरोपीय संघ में भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और हाल के वर्षों में वस्तुओं के द्विपक्षीय व्यापार ने आठ अरब अमेरिकी डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया है। स्पेन की कंपनियों ने भारत में विशेष रूप से आधारभूत संरचना, नवीकरणीय ऊर्जा, शहरी परिवहन, इंजीनियरिंग, जल प्रबंधन और स्मार्ट शहरों के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई है। वहीं भारतीय कंपनियां भी सूचना प्रौद्योगिकी औषधि और वाहन कलपुर्जों के क्षेत्र में स्पेन में सक्रिय हैं। जयशंकर ने कहा कि हम इस व्यापारिक सहयोग को और गहरा करने की व्यापक संभावनाएं देखते हैं।

जयशंकर ने कहा कि वडोदरा में एयरबस टाटा सी 295 अंतिम असेंबली लाइन का उद्घाटन अक्टूबर 2024 में हमारे नेताओं द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। हमें इस वर्ष सितंबर से पहले कारखाने से पहले मेड इन इंडिया सी 295 विमान के बाहर आने की उम्मीद है। जयशंकर ने कहा कि यह हमारे रक्षा औद्योगिक सहयोग की बढ़ती गहराई और मजबूत विनिर्माण क्षमताओं के निर्माण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

जयशंकर ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था स्पष्ट रूप से गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। साझा चुनौतियों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। यह विशेष रूप से आतंकवाद से मुकाबले के संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और स्पेन दोनों ही इसके शिकार रहे हैं। जयशंकर ने कहा कि विश्व को आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता प्रदर्शित करनी होगी।

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