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मदर ऑफ़ ऑल डील

भारत और यूरोपीय संघ ने बीते मंगलवार को मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। मै नफीस जाफरी आपको यह बता दू कि यह समझौता वर्षों की बातचीत के बाद हुआ और हाल के इतिहास में सबसे महत्वाकांक्षी ग्लोबल मार्केट का द्वार खोलता है। इसे मदर ऑफ
ऑल डील क्यों कहा जा रहा है और दुनिया भर में इस समझौते को लेकर क्यों चर्चा बनी हुई है, इसे यहां समझिए…समझौते की घोषणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में संयुक्त रूप से
किया। दोनों पक्षों ने इसे द्विपक्षीय संबंधों में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया। भारत विश्व का चौथा और और यूरोपीय संघ दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ग्लोबल जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत और विश्व व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इन्हीं देशों से आता है। समझौते के बाद अधिकारियों ने कहा, यह सिर्फ एक व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक रणनीतिक साझेदारी है। उन्होंने
इस बात पर जोर दिया कि यह समझौता केवल टैरिफ कट तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सर्विसेज, डिजिटल ट्रेड, मोबिलिटी, स्थिरता और उभरती टेक्नोलॉजी भी शामिल हैं। इस समझौते का मुख्य आधार भारतीय निर्यातकों के लिए एक बहुत बड़े बाजार तक पहुंच है। व्यापार मूल्य के हिसाब से 99 प्रतिशत से अधिक भारतीय वस्तुओं को यूरोपीय संघ में तरजीही प्रवेश मिलेगा, जिससे 75 अरब अमेरिकी डॉलर
(लगभग 6.41 लाख करोड़ रुपये) से अधिक के निर्यात में भारी वृद्धि होने की उम्मीद है। खासकर लेबर प्रधान क्षेत्रों जैसे कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न और आभूषण तथा हस्तशिल्प में भारी लाभ की उम्मीद है। इस समझौते के लागू होते ही लगभग 33 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात पर 10 प्रतिशत तक का टैरिफ समाप्त कर दिया जाएगा। बहरहाल, कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि दुनिया के दो सबसे बड़े बाजार जब हाथ मिलाते हैं, तो हलचल सिर्फ व्यापार में ही नहीं, बल्कि जियो-पॉलिटिक्स में भी होती है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने मदर ऑफ ऑल डील्स करार दिया है। लेकिन सवाल वही है कि इस डील में ऐसा क्या खास है जो इसे बाकी समझौते से अलग बना रहा है। जब बात 28 देशों की आती है को इस एफटीए को महज एक
ट्रेड एग्रीमेंट कहना गलत होगा। इसमें बाजार का महाकुंभ, चीन का ऑप्शन और तकनीक को बूस्ट देने वाली तमाम समझौते शामिल हैं। एक तरफ 140 करोड़ भारतीयों का उभरता हुआ मिडिल क्लास है, तो दूसरी तरफ 27 देशों का अमीर यूरोपीय बाजार। इन दोनों का मिलना वैश्विक जीडीपी के एक बड़े हिस्से को री-शेप करेगा। यूरोपियन यूनियन की कुल जीडीपी की बात करें तो वो करीब 20 ट्रिलियन डॉलर
है। भारत के साथ आने से 140 करोड़ लोगों की डिमांड इस डील को मदर ऑफ ऑल डील्सश् बना देती है। यूरोप अब\ अपनी सप्लाई चेन के लिए चीन पर डिपेंडेंसी कम करना चाहता है। और इसके लिए भारत इस खाली जगह को भरने के लिए सबसे भरोसेमंद पार्टनर बनकर उभरा है। यह डील केवल सामान बेचने तक सीमित नहीं है। इसमें ग्रीन एनर्जी, डिजिटल गवर्नेंस और डिफेंस जैसे वो क्षेत्र शामिल हैं, जो
किसी देश के लिए आधुनिक समय में बहुत जरूरी हो गया है। इस डील से यूरोप में भारत से जाने वाले कपड़े, दवाइयां, स्टील और पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाली ड्यूटी कम होगी, जिससे विदेशी बाजार में भारतीय सामान सस्ता और कॉम्पिटिटिव होगा। एक बात साफ है यह केवल व्यापार के बारे में तो नहीं है। यह 21वीं सदी की वो आर्थिक कहानी है, जिससे आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था के मौर्चे पर शानदार नतीजे देखे जाएंगे। आसान भाषा में कहें तो ग्लोबल इकोनॉमी का केंद्र ही बदल जाएगा। साल 2007 से इस डील पर बात चल रही थी। यानी इस मदर ऑफ ऑल डील्स का रास्ता लंबा जरूर है, लेकिन दोनों देशों की जरूरतें इसे हकीकत बनाने के करीब ले जा रही हैं। यह डील देश के विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए सबसे बड़ा बूस्टर डोज साबित होगी।

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