कोरोना काल में जब पूरी दुनिया घरों में कैद थी, तब केरल की एक रिटायर टीचर सुसान थॉमस ने अपने फुर्सत के पलों को किसी की जिंदगी संवारने का जरिया बनाया। सुसान ने कर्नाटक की रहने वाली एक वंचित वर्ग की छात्रा ‘डेजी’ को अगले पांच सालों तक सिर्फ फोन कॉल के जरिए इंग्लिश पढ़ाना शुरू किया। देश के ऐसे इलाकों में जहां इंटरनेट या स्मार्टफोन नहीं था फोन पर पढ़ाने से कई बच्चों की जिंदगी बेहतर हुई। देश के 18 राज्यों में 3000 से ज्यादा शिक्षकों ने 11 हजार से ज्यादा बच्चों को ऐसे ही फोन पर पढ़ाया। 12 साल से चल रही इस मुहिम में रिटायर्ड शिक्षक और वॉलेंटियर्स जुड़े। आज नतीजा यह है कि कभी शर्मीली और डरी रहने वाली डेजी जैसी हजारों बच्चे न केवल फर्राटेदार इंग्लिश बोलते हैं, बल्कि आत्मविश्वास से लबरेज है। सुसान ने डेजी के साथ 40-40 मिनट के कुल 450 सेशन किए।
नियम- मां पिता की मौजूदगी में ही कॉल पर पढ़ाई होती है
बदलते समय के साथ संस्था ने अब ग्रुप वीडियो कॉल भी शुरू की हैं। हालांकि, बच्चों की सुरक्षा को लेकर कड़े नियम बनाए गए हैं।
बैकग्राउंड चेक: वॉलेंटियर का बैकग्राउंड चेक होता है।
मॉनिटरिंग: हर सेशन की निगरानी की जाती है।
पैरेंट्स की मौजूदगी: क्लास के दौरान माता-पिता में से किसी एक का पास होना अनिवार्य है।
बिना देखे- घर की ‘प्राइवेसी’ बनी रही, पढ़ाई आसान हो गई
मीरा कहती हैं- फोन कॉल पर पढ़ाने में बड़ी चुनौती ‘विजुअल मीडियम’ का न होना था। बच्चे को बिना देखे उसे मोटिवेट करना कठिन था। लेकिन ग्रामीण परिवारों को लगा कि इससे उनकी प्राइवेसी सुरक्षित है। वीडियो कॉल में घर की स्थिति उजागर होने का डर रहता है। ऑडियो कॉल में बच्चे और माता-पिता सहज महसूस करते थे।
ग्रामीण भारत के लिए वरदान बनी यह तकनीक
आशा इनफिनिट फाउंडेशन की संस्थापक सी.वी. मीरा रमन ने बताया कि यह पहल उन ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा सफल रही जहां इंटरनेट की कनेक्टिविटी खराब थी। महामारी के दौरान यह मॉडल ‘हिट’ रहा क्योंकि माता-पिता घर पर थे। बच्चों के पास फोन उपलब्ध था। शिक्षक और छात्र एक-दूसरे से इतने दूर होते हैं कि वे कभी मिलते नहीं, लेकिन फोन पर गहरा रिश्ता होता है।
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