“‘मिया मुस्लिम’ विवाद पर ओवैसी का पलटवार: मंच से हिमंता सरमा पर कसा तंज”

कोई मुसलमान रिक्शेवाला अगर पांच रुपए मांगे तो उसे चार रुपए दो, खूब परेशान करो।” ये बेहुदा और घटिया बयान देने वाले और कोई नहीं हैं बल्कि असम के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री मोदी के लाडले हिमंत बिस्वा सरमा हैं। वो संविधान की शपथ लेकर संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। देश में नफरत का बीज बो रहे हैं। वो बीजेपी और संघ की नफरती सोच आगे बढ़ा रहे हैं। उनका ये बयान बाबा साहेब के संविधान के खिलाफ है जो हर नागरिक को बराबर का अधिकार देता है। सोचिये पीएम मोदी ऐसे नफरती और हिंसक भाषण देने वाले लोगों को खुला समर्थन देते हैं। मोदी सरकार में ऐसे लोगों का प्रमोशन होता है। लेकिन अब लगता है हिमंत बिस्वा सरमा को उनका ये बयान उनपर काफी भारी पड़ने लगा है।

एक तरफ जहां 43 नागरिकों के एक समूह ने गुवाहाटी HC से बिस्वा सरमा द्वारा बार-बार दिए गए ‘हेट स्पीच’ पर स्वतः संज्ञान लेने की अपील की है। तो वहीं अब AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने हिमंत बिस्वा सरमा का मजाक उड़ाते हुए ऐसी बात बोल दी है जिससे असम सीएम की बुरी तरह से किरकिरी हो रही है। असम के विधानसभा चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। ऐसे में चुनावों से पहले राज्य में बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ जहां कांग्रेस असम में अपनी जबरदस्त वापसी की तैयारियों में जुटी है तो वहीं लगता है सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के पास अपने कामों को गिनाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं रह गया। यही कारण है कि वो राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा बनाकर असम में हिंदू–मुस्लिम ध्रुवीकरण करके चुनाव जीतने की प्लानिंग कर रही है। इसी को देखते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपने नफरती बयानों की धार तेज कर दी है।

उन्होंने हाल ही में संविधान को ताक पर रखते हुए ऐसा नफरती और जहरीला बयान दिया जो पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने कमजोर और राज्य के गरीब मुसलमानों को निशाना बनाते हुए कहा कि अगर ऑटो चलाने वाला मिया मुस्लिम है, तो उसे तय किराए से कम पैसे दें। हिमंत बिस्वा सरमा के इसी बयान पर AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने तंज कसते हुए पलटवार किया है। निजामाबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने ‘मियां मुस्लिम’ वाले बयान को लेकर मुख्यमंत्री सरमा का मजाक उड़ाया और सीमा विवाद के मुद्दे पर भाजपा–आरएसएस की घेराबंदी की। उन्होंने असम के मुख्यमंत्री का मजाक उड़ाते हुए कहा, “मुझे पता है कि तुम दो रुपये के भिखारी हो… क्या मैं इसे तुम्हारे अकाउंट में ट्रांसफर कर दूं?” ओवैसी के इस बयान के बाद सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है और असम की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई है।

ओवैसी यहीं नहीं रुके। उन्होंने हिमंत बिस्वा सरमा पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि असम के मुख्यमंत्री जानबूझकर समाज को बांटने की राजनीति कर रहे हैं। ओवैसी ने कहा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो या फिर सड़क पर मेहनत करने वाला कोई गरीब नागरिक। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सरमा न सिर्फ संविधान की भावना के खिलाफ बयान दे रहे हैं, बल्कि खुलेआम भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं। ओवैसी ने यह भी कहा कि मुसलमानों को बार-बार जनसंख्या के मुद्दे पर डर दिखाया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत में मुस्लिम आबादी कभी भी हिंदू आबादी से ज्यादा नहीं होगी। उन्होंने दो टूक कहा कि यह एक झूठा नैरेटिव है, जिसे बीजेपी और आरएसएस चुनावी फायदे के लिए बार-बार हवा देते हैं। ओवैसी के मुताबिक, “मुस्लिम आबादी स्थिर हो जाएगी, लेकिन बीजेपी का झूठ कभी खत्म नहीं होगा।

” हैदराबाद से सांसद ओवैसी ने निजामाबाद की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया राज्यसभा भाषण का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री गर्व से कहते हैं कि भारत की आबादी युवा है, लेकिन अगर उनसे पूछा जाए कि इस युवा आबादी के लिए रोजगार क्या है, स्किल ट्रेनिंग क्या है, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं है। ओवैसी ने सवाल उठाया कि देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी 40 साल से कम उम्र की है, लेकिन सरकार ने उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए क्या किया? ओवैसी ने आगे कहा कि 20–25 साल बाद यही युवा आबादी बूढ़ी हो जाएगी और तब देश को भारी आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने महंगाई, स्वास्थ्य खर्च और पेंशन जैसी समस्याओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि सरकार इन मुद्दों पर गंभीरता से सोचने के बजाय मुसलमानों की जनसंख्या को लेकर डर फैलाने में लगी है।ओवैसी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान पर भी तंज कसा, जिसमें उन्होंने कम से कम तीन बच्चे पैदा करने की सलाह दी थी।

ओवैसी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि “जो खुद ऐसा नहीं करते, वही दूसरों को ज्ञान दे रहे हैं।” उन्होंने कहा कि पहले जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात करके मुसलमानों को निशाना बनाया गया और अब जब सरकार को समझ आ गया है कि देश की आबादी बूढ़ी होने जा रही है, तो वही लोग ज्यादा बच्चों की बात करने लगे हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा अपने बयान पर सफाई देते नजर आए। उन्होंने कहा कि ‘मिया’ शब्द उन्होंने नहीं गढ़ा है और यह शब्द खुद बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय के भीतर प्रचलित है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि मुख्यमंत्री चाहे जितनी सफाई दे लें, उनके बयान का मकसद साफ है—एक खास समुदाय को निशाना बनाना और चुनावी लाभ के लिए नफरत को हवा देना। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम में बीजेपी की राजनीति अब विकास से हटकर पहचान की राजनीति पर ज्यादा निर्भर हो गई है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हो या ‘मिया मुस्लिम’ का जिक्र, हर बार कोशिश यही रहती है कि चुनाव से पहले समाज को दो हिस्सों में बांट दिया जाए। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं और इसे संविधान व सामाजिक सौहार्द पर सीधा हमला बता रहे हैं। वहीं इस बीच ओवैसी का एक और बयान सोशल मीह पर वायरल हो रहा है जिसमें ओवैसी ने अपने भाषण में केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने टी20 विश्व कप के दौरान भारत के खिलाफ मैच खेलने से पाकिस्तान के इनकार पर कहा कि जब भारत मेजबान देश है, तो पाकिस्तान जैसी “बेकार टीम” को साफ शब्दों में बता देना चाहिए था कि अगर खेलना नहीं है तो यहां आने की जरूरत क्या थी। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ऐसे मामलों में चुप्पी साध लेती है। इसके साथ ही ओवैसी ने चीन के साथ सीमा विवाद का मुद्दा भी उठाया।

उन्होंने कहा कि सरकार चीन के मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचती है, जबकि देश की जमीन और सुरक्षा का सवाल है। ओवैसी के मुताबिक, सरकार को जनता को सच बताना चाहिए, न कि ध्यान भटकाने के लिए सांप्रदायिक मुद्दों को उछालना चाहिए। वहीं असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। दरअसल, असम में 43 नागरिकों द्वारा गुवाहाटी हाईकोर्ट में दाखिल याचिका ने भी सियासी तापमान बढ़ा दिया है। याचिका में मांग की गई है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बार-बार दिए गए कथित हेट स्पीच पर अदालत स्वतः संज्ञान ले। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से ऐसी भाषा की उम्मीद नहीं की जा सकती और यह सीधे तौर पर सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाती है। बीजेपी हालांकि इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि विपक्ष चुनावी हार के डर से मुद्दों को बेवजह तूल दे रहा है।

बीजेपी का दावा है कि असम में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है और घुसपैठ जैसे गंभीर मुद्दों पर सख्ती जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी समुदाय को सार्वजनिक रूप से निशाना बनाकर कानून-व्यवस्था सुधारी जा सकती है? ओवैसी के तीखे बयानों के बाद असम की राजनीति में बयानबाजी और तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर भी हिमंत बिस्वा सरमा और ओवैसी के बयान वायरल हो रहे हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री के समर्थक उनके बचाव में उतर आए हैं, तो दूसरी तरफ बड़ी संख्या में लोग इसे खुलेआम नफरत फैलाने वाला बयान बता रहे हैं। चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, यह साफ होता जा रहा है कि असम में मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि दो सोचों के बीच है—एक तरफ संविधान, समानता और रोजगार जैसे मुद्दे हैं, तो दूसरी तरफ पहचान, डर और नफरत की राजनीति। ओवैसी का हमला इसी दूसरी सोच पर है, जिसमें वो बार-बार यह याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत का संविधान किसी एक धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए बराबर है। अब देखना यह होगा कि असम की जनता इस सियासी शोर शराबे में किसे तरजीह देती है।

 

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