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हूतियों के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई की तैयारी, सऊदी अरब ने प्रस्ताव का किया विरोध

तेल अवीव/रियाद। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान में शामिल होने की संभावनाएं तलाश रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका के माध्यम से सऊदी अरब के सामने हूतियों के खिलाफ कार्रवाई में इजराइल की भागीदारी का प्रस्ताव रखा है। हालांकि, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब को आशंका है कि इस अभियान में इजराइली सेना की भागीदारी से अरब जगत में नाराजगी बढ़ सकती है और क्षेत्रीय तनाव गहरा सकता है।

हूतियों के खिलाफ कार्रवाई में इजराइल की दिलचस्पी क्यों?

1. सऊदी अरब के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश

इजराइल की नजर सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने पर है। यमन में हूती विद्रोहियों को दोनों देश सुरक्षा चुनौती के रूप में देखते हैं। ऐसे में हूतियों के खिलाफ सहयोग से इजराइल को सऊदी अरब के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित करने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।

2. ईरान के प्रभाव को कमजोर करना

हूती विद्रोहियों और ईरान के बीच लंबे समय से संबंध रहे हैं। सऊदी अरब और अमेरिका का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराता है। हालांकि, ईरान की भूमिका और सहायता की सीमा को लेकर क्षेत्रीय विवाद बना हुआ है।

हूती विद्रोही ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हमले करने की क्षमता रखते हैं। लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास जहाजों पर उनके हमलों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित किया है। इजराइल भी हूतियों के हमलों का निशाना बन चुका है। ऐसे में इजराइल उन्हें कमजोर करके ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना चाहता है।

3. सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाना

सऊदी अरब लंबे समय से हूती विद्रोहियों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। इजराइल इस मुद्दे पर सहयोग की पेशकश करके सऊदी अरब के साथ सुरक्षा और सैन्य समन्वय बढ़ाना चाहता है। हालांकि, इस तरह के सहयोग को लेकर सऊदी अरब के भीतर और दूसरे अरब देशों में विरोध की आशंका भी बनी हुई है।

फिलिस्तीन मुद्दे के कारण इजराइल से दूरी बनाए हुए है सऊदी अरब

इजराइल और सऊदी अरब के बीच अब तक औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं हुए हैं। अमेरिका लंबे समय से दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य कराने की कोशिश करता रहा है। वर्ष 2020 में अब्राहम समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन सहित कुछ अरब देशों ने इजराइल के साथ अपने संबंध सामान्य किए थे।

हालांकि, सऊदी अरब ने फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान को इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने की अपनी प्रमुख शर्तों में शामिल किया है। इसी वजह से सुरक्षा संबंधी साझा चिंताओं के बावजूद दोनों देशों के बीच औपचारिक सहयोग का रास्ता आसान नहीं है।

2015 से हूती विद्रोहियों के खिलाफ संघर्ष कर रहा है सऊदी अरब

यमन में हूती विद्रोहियों ने वर्ष 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को समर्थन देने के लिए सैन्य अभियान शुरू किया।

कई वर्षों तक चले हवाई हमलों और सैन्य कार्रवाई के बावजूद हूती विद्रोहियों को पूरी तरह पराजित नहीं किया जा सका। वे अब भी यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए हुए हैं। लाल सागर में जहाजों पर हमलों और इजराइल को निशाना बनाने की घटनाओं ने इस संघर्ष को क्षेत्रीय सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बना दिया है।

फिलहाल, इजराइल की सैन्य भागीदारी को लेकर सऊदी अरब का विरोध इस बात का संकेत है कि मध्य पूर्व में साझा सुरक्षा चिंताओं के बावजूद राजनीतिक और कूटनीतिक समीकरण काफी जटिल बने हुए हैं।

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