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यूपी फतह की जंग तेज: ‘ऊपर मोदी-नीचे योगी’ नारे के साथ BJP मैदान में, अखिलेश का PD+A फॉर्मूला देगा कड़ी टक्कर

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव एक वर्ष बाद फरवरी 2027 में होने हैं, लेकिन इस राज्य में राजनीतिक गतिविधियां अभी से इतनी तेज हो गई हैं जितनी पहले कभी नहीं देखी गईं। 2017 से सत्ता में बनी हुई भाजपा के लिए तीसरी बार की जीत अनिवार्य है, जबकि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के लिए यह अपने अस्तित्व को बचाने और लोकसभा चुनाव 2024 में 37 सीटें जीतकर बनाई गई बढ़त को बरकरार रखने की प्रबल चुनौती है। दोनों प्रमुख दलों ने अपनी गुप्त रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं और उनके प्रमुख नेताओं की सक्रियता एकाएक बढ़ गई है।

25 जनवरी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मथुरा यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की सराहना की। उससे एक दिन पूर्व, उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस पर केंद्रीय गृह मंत्री और कुशल रणनीतिकार अमित शाह ने स्पष्ट किया कि भाजपा योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी और जीत मिलने पर वही मुख्यमंत्री होंगे। शाह ने दो-टूक कहा— “ऊपर मोदी, नीचे योगी।” यह बात किसी से छिपी नहीं है कि शाह और योगी के बीच लंबे समय से कड़वाहट की चर्चा रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरी ताकत से योगी आदित्यनाथ के साथ खड़ा है। यह तथ्य जगजाहिर है कि मोदी के बाद योगी आदित्यनाथ देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता हैं।

हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में इन नेताओं की लोकप्रियता वैसी सफलता नहीं दिला पाई और भाजपा महज 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि उसका रालोद और अपना दल जैसे स्थानीय दलों के साथ मजबूत गठबंधन था। इसमें अपना दल (अनुप्रिया पटेल) को एक और रालोद को दो सीटें मिलीं। वहीं सपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 37 सीटें जीतीं और उसकी सहयोगी कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। नगीना सीट से उभरते दलित नेता चंद्रशेखर ने जीत दर्ज की।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के बाद से फिलहाल माहौल भाजपा के पक्ष में नहीं दिख रहा है। पार्टी के समक्ष कई चुनौतियां हैं, जैसे ब्राह्मणों की नाराजगी, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ योगी आदित्यनाथ की तनातनी और पुलिस के कथित दुर्व्यवहार से स्वर्ण जातियों में उपजा असंतोष। योगी आदित्यनाथ के रुख में शंकराचार्यों को लेकर कोई नरमी नहीं दिख रही है, जिसे जानकार उनकी ‘हठ’ मान रहे हैं। इसके अलावा, यूजीसी के भेदभावपूर्ण नियमों और सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद भाजपा नेतृत्व के अड़ियल रवैये से स्वर्ण युवाओं में नाराजगी है।

भाजपा की इन विफलताओं को भुनाने के लिए अखिलेश यादव ने तत्परता दिखाई है और ब्राह्मणों व अन्य स्वर्ण जातियों को साधना शुरू कर दिया है। सपा के राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र चौधरी ने कहा कि प्रदेश में ब्राह्मणों का उत्पीड़न हो रहा है और व्यापारी असुरक्षित हैं। उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश से भाजपा की विदाई और अखिलेश यादव का आगमन तय है। चौधरी ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का नारा ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) है, लेकिन वे विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य समाज को भी भरपूर टिकट देंगे। उनका मानना है कि शहरी सीटों पर बनियों को उम्मीदवार बनाकर वे भाजपा को कड़ी चुनौती देंगे।

राजेंद्र चौधरी ने यह भी कहा कि कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन जारी रहेगा और भाजपा 100 से नीचे सिमटेगी। लोकसभा चुनाव 2024 के आंकड़ों के अनुसार, सपा गठबंधन 217 और भाजपा गठबंधन 174 विधानसभा सीटों पर आगे रहा था। विपक्ष के लिए चंद्रशेखर, ओवैसी और मायावती की बसपा भी चुनौती पेश करेंगे, जिसमें भाजपा अपनी उम्मीदें तलाश रही है। मुस्लिम मतदाता फिलहाल भाजपा को हराने वाले सबसे मजबूत दल के पक्ष में लामबंद दिख रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अभी तक दलित वर्ग को बड़े पदों पर प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। रालोद के कोटे से मंत्री बने अनिल कुमार अपने सीमित दायरे में हैं। वहीं, भाजपा ने भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया है। सपा ने पश्चिम की सीटों पर जाटों को उतारने की रणनीति बनाई है, जिससे भाजपा के लिए मेरठ प्रांत में गैर-जाट अध्यक्ष बनाना जोखिम भरा हो सकता है। जानकारों के मुताबिक, चौधरी भूपेंद्र सिंह, संजीव बालियान और मोहित बेनीवाल जैसे स्थापित जाट नेता नहीं चाहते कि कोई नया ऊर्जावान जाट चेहरा कमान संभाले।

हालांकि, नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी पश्चिम में जाट बिरादरी को ही कमान सौंपने के पक्षधर हैं। किसान बिरादरियों में आज भी चौधरी चरण सिंह के प्रति गहरा सम्मान है। भाजपा तभी सफल हो सकती है जब वह पश्चिम में जाटों की नाराजगी दूर करे, जो दिल्ली और हरियाणा के घटनाक्रमों के कारण पहले से ही खफा हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश की जातीय उथल-पुथल भाजपा के अनुकूल नहीं लगती। आरएसएस द्वारा आयोजित छोटे सम्मेलन भी फिलहाल नई उम्मीद जगाते नहीं दिख रहे हैं। कुल मिलाकर, ताजा हालात विपक्ष के लिए उत्साहजनक हैं और भाजपा को तीसरी बार सत्ता पाने के लिए अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना होगा।

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