पाली | राजस्थान के पाली जिले से एक ऐसी हृदयविदारक और भावुक कर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने मानवीय रिश्तों और सच्ची दोस्ती की परिभाषा को एक नया आयाम दे दिया है। सुमेरपुर उपखंड के तखतगढ़ नगर में रविवार का दिन पूरे इलाके के लिए कभी न भूलने वाला पल बन गया। यहां दो बुजुर्ग सहेलियों ने जीवन भर के साथ को मौत के बाद भी बखूबी निभाया। तखतगढ़ के नागचौक स्थित देवासियों की गली में रहने वाली जेठी बाई और भीखी बाई की दोस्ती पूरे मोहल्ले में मशहूर थी। लोग उनकी बॉन्डिंग की अक्सर मिसाल दिया करते थे।

सहेली की मौत और सदमे का असर: रविवार को जेठी बाई (पत्नी मालाराम कलबी) का लंबी उम्र के चलते अचानक निधन हो गया। जैसे ही यह दुखद खबर उनकी परम मित्र और पड़ोसी भीखी बाई तक पहुंची, वह पूरी तरह से बेसुध हो गईं। भीखी बाई (पत्नी भूराराम कलबी) अपनी सहेली के जाने का दुख सहन नहीं कर सकीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वह अपनी सहेली की मौत की खबर सुनकर गहरे सदमे में चली गई थीं और लगातार रो रही थीं। हैरानी की बात यह रही कि जेठी बाई की मृत्यु के महज कुछ ही मिनटों के भीतर भीखी बाई की भी सांसें थम गईं। मानो दोनों ने इस दुनिया से साथ जाने का कोई गुप्त वादा किया हो।

पूरे नगर में शोक की लहर: एक साथ दो बुजुर्ग महिलाओं के निधन से पूरे देवासियों की गली और तखतगढ़ नगर में शोक की लहर दौड़ गई। हर कोई इस अनोखे संयोग को देखकर हैरान था और उनकी दोस्ती की चर्चा कर रहा था। मोहल्ले के लोगों का कहना है कि दोनों सहेलियां दिन भर साथ बैठती थीं। सुख-दुख की बातें साझा करना और एक-दूसरे का सहारा बनना उनकी दशकों पुरानी दिनचर्या का एक अभिन्न हिस्सा था। उनके परिजनों के लिए यह एक दोहरी क्षति थी। लेकिन इस अनोखी और पवित्र मित्रता ने उन्हें एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेने के लिए प्रेरित किया। समाज के बुजुर्गों ने भी इस पर अपनी सहमति दी।

एक ही चिता पर अंतिम विदाई: जब दोनों सहेलियों की शवयात्रा एक साथ निकाली गई, तो श्मशान घाट तक का पूरा रास्ता लोगों की भारी भीड़ से भर गया। हर आंख नम थी और सबकी जुबां पर उनकी दोस्ती के ही किस्से थे। परिजनों ने आपसी सहमति से तय किया कि जब ये दोनों जीवन भर एक-दूसरे के साथ रहीं, तो इनकी अंतिम यात्रा और संस्कार भी साथ ही होना चाहिए। इसके बाद दोनों का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर किया गया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद सैकड़ों लोगों का कलेजा पसीज गया। यह घटना न केवल एक संयोग है, बल्कि उन लोगों के लिए एक बड़ा संदेश है जो आज के दौर में रिश्तों को बोझ समझने लगे हैं।

अमर हो गई जेठी और भीखी की दोस्ती: आज के भागदौड़ भरे दौर में जहां रिश्तों में दरारें बहुत जल्दी आ जाती हैं, वहां इन दो बुजुर्ग महिलाओं ने साबित कर दिया कि दोस्ती सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। तखतगढ़ के लोगों के लिए जेठी बाई और भीखी बाई अब केवल नाम नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, त्याग और निस्वार्थ प्रेम का एक जीवंत प्रतीक बन चुकी हैं। उनकी यह कहानी वर्षों तक सुनाई जाएगी। प्रशासन और स्थानीय प्रबुद्ध लोगों ने भी इस घटना को एक अत्यंत दुर्लभ और भावुक संयोग माना है। सोशल मीडिया पर भी इस अनोखी विदाई की तस्वीरें और खबरें अब तेजी से वायरल हो रही हैं। इस घटना ने यह भी दिखाया कि आत्माओं का जुड़ाव शरीर के खत्म होने के बाद भी समाप्त नहीं होता। दोनों सहेलियों ने एक साथ चिता पर लेटकर अपनी मित्रता को हमेशा के लिए अमर कर दिया है। यह सच्ची श्रद्धांजलि थी।