वाराणसी। रामनगर में रामलीला मेले के दौरान एक हाथी के अचानक आक्रामक होकर उत्पात मचाने की घटना ने लोगों में दहशत फैला दी। गुस्साए हाथी ने कई पेड़ों को उखाड़ दिया और उसे नियंत्रित करने में महावतों तथा रेस्क्यू टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी। हालात बिगड़ने पर आसपास के करीब दो किलोमीटर क्षेत्र में रास्तों को बंद करना पड़ा, ताकि लोगों को सुरक्षित रखा जा सके।
कानपुर चिड़ियाघर की रेस्क्यू टीम ने पशु चिकित्सक डॉ. नासिर खान के नेतृत्व में हाथी को काबू करने का अभियान चलाया। कई जिलों से आए महावतों ने भी उसे शांत करने की कोशिश की, लेकिन हाथी अपने मुख्य महावत के घायल होने के बाद दूसरे महावतों के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा था। आखिरकार, विशेषज्ञों ने उसे दवा देकर नियंत्रित करने का फैसला लिया।
हथिनी के वापस लौटने के बाद बदला हाथी का व्यवहार
रेस्क्यू टीम के पशु चिकित्सक डॉ. नासिर खान के अनुसार, हाथी के आक्रामक होने के संभावित कारणों में हार्मोनल बदलाव और मादा हाथी से संपर्क के बाद उसके व्यवहार में आया परिवर्तन शामिल हो सकता है। महावतों ने बताया कि रामलीला मेले में बिहार से एक हथिनी आई थी, जो प्रजनन के अनुकूल अवस्था में थी। कुछ दिन मेले में रहने के बाद हथिनी को वापस बिहार भेज दिया गया।
डॉक्टर के मुताबिक, हथिनी के जाने के लगभग एक सप्ताह बाद हाथी के व्यवहार में बदलाव दिखाई देने लगा। हाथियों की सूंघने की क्षमता काफी तेज होती है और वे गंध के माध्यम से मादा हाथी की प्रजनन अवस्था का पता लगा सकते हैं। ऐसे में हथिनी के चले जाने के बाद नर हाथी में बेचैनी और आक्रामकता बढ़ने की संभावना जताई गई।
हालांकि, चिकित्सक ने स्पष्ट किया कि हाथी के व्यवहार को केवल प्रेम या वियोग से जोड़ना सही नहीं होगा। इसके पीछे हार्मोनल परिवर्तन और मस्त जैसी अवस्था भी संभावित कारण हो सकते हैं।
पांच घंटे तक चला हाथी को पकड़ने का अभियान
डॉ. नासिर खान के अनुसार, 18 अक्टूबर को घटना की सूचना मिलने के बाद वह शाम करीब छह बजे घटनास्थल पर पहुंचे। अभियान में गोरखपुर की टीम, वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी और लगभग 25 महावतों सहित करीब 50 से 60 लोग शामिल थे।
शुरुआत में हाथी के मालिक ने दवा देकर बेहोश करने के बजाय उसे शारीरिक रूप से नियंत्रित करने की कोशिश करने को कहा। इसके बाद शाम सात बजे से रात 12 बजे तक महावतों ने हुक और चेन की मदद से हाथी को पकड़ने का प्रयास किया। लगातार कोशिशों के बावजूद हाथी काबू में नहीं आया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विशेषज्ञों ने ट्रैंक्विलाइजिंग गन से दवा देने का निर्णय लिया। इसके लिए हाथी को दोनों तरफ से घेरने की योजना बनाई गई। उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाने और जरूरत पड़ने पर संभालने के लिए जेसीबी की व्यवस्था भी की गई।
दवा देने के बाद हाथी की सुरक्षा पर विशेष ध्यान
पशु चिकित्सक ने बताया कि बेकाबू हाथी के रेस्क्यू के दौरान सबसे पहले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी होता है। इसके लिए पुलिस तथा प्रशासन की मदद ली जाती है। हाथी को नियंत्रित करने के लिए दवा का इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब सामान्य तरीके कारगर साबित न हों।
दवा का असर होने के बाद हाथी की शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखनी पड़ती है। यदि वह ऐसी अवस्था में बैठ जाता है, जिससे उसके फेफड़ों पर दबाव पड़ने या सांस लेने में परेशानी होने का खतरा हो, तो विशेषज्ञों को उसकी स्थिति सुरक्षित तरीके से बदलनी पड़ सकती है। इतने भारी जानवर को संभालने के लिए विशेष उपकरणों की जरूरत भी पड़ सकती है।
मस्त की अवस्था में बढ़ सकती है नर हाथियों की आक्रामकता
डॉ. नासिर खान के मुताबिक, नर हाथियों में मस्त नामक अवस्था के दौरान हार्मोनल बदलाव के कारण आक्रामकता बढ़ सकती है। इस दौरान हाथी कभी-कभी अपने परिचित महावत के प्रति भी आक्रामक व्यवहार कर सकते हैं।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि रामनगर की घटना में हाथी पूरी तरह मस्त की अवस्था में था, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती। उसके व्यवहार में इस अवस्था से मिलते-जुलते लक्षण दिखाई देने की बात कही गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, हाथी को नियंत्रित करने के बाद शांत और एकांत स्थान पर रखना, नियमित निगरानी करना तथा आवश्यकता के अनुसार उपचार देना जरूरी होता है। उसकी स्थिति के आधार पर निगरानी की अवधि कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक हो सकती है।
टस्कर और मकना हाथियों में क्या है अंतर?
पशु चिकित्सक ने बताया कि एशियाई हाथियों में टस्कर और मकना शब्दों का इस्तेमाल नर हाथियों के दांतों के आधार पर किया जाता है। टस्कर नर हाथी के बाहर निकले बड़े दांत होते हैं, जबकि मकना नर हाथी में ये दांत दिखाई नहीं देते या बहुत छोटे होते हैं।
हाथी सामाजिक प्राणी हैं और उनके समूह में अनुभवी हाथियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समूह के प्रमुख हाथी की मृत्यु होने पर अन्य हाथियों के व्यवहार और समूह की व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
वाराणसी की यह घटना एक बार फिर बताती है कि हाथियों के व्यवहार में अचानक बदलाव आने पर प्रशिक्षित विशेषज्ञों की मदद और सुरक्षा संबंधी सावधानियां कितनी जरूरी हैं। ऐसे मामलों में बिना उचित प्रशिक्षण के हाथी को काबू करने की कोशिश करना लोगों और जानवर, दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है।
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