अमेरिका में एक चौंकाने वाले मामले में कोर्ट ने प्रेग्नेंट महिला को वर्क फ्रॉम होम (WFH) की अनुमति न देने पर कंपनी पर भारी जुर्माना लगाया है। इस फैसले ने वर्कप्लेस पर महिलाओं के अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
क्या है पूरा मामला
ओहायो की रहने वाली चेल्सी वॉल्श नाम की महिला Total Quality Logistics (TQL) में काम करती थीं। फरवरी 2021 में उन्होंने अपनी हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी के चलते वर्क फ्रॉम होम की अनुमति मांगी थी। लेकिन कंपनी ने उन्हें दो ही विकल्प दिए—ऑफिस आकर काम करें या बिना सैलरी छुट्टी लें।
ऑफिस जाने की मजबूरी बनी हादसे की वजह
मजबूरी में महिला को ऑफिस जाना पड़ा। लगातार तीन दिन काम करने के बाद 24 फरवरी को उन्हें समय से पहले डिलीवरी हो गई। बच्ची का जन्म तय समय से करीब 18 हफ्ते पहले हुआ था। जन्म के समय बच्ची सांस ले रही थी, लेकिन करीब डेढ़ घंटे बाद उसकी मौत हो गई।
कोर्ट ने कंपनी को ठहराया जिम्मेदार
यह मामला ओहायो के हैमिल्टन काउंटी कोर्ट में चला, जहां जूरी ने कंपनी को दोषी माना। कोर्ट ने कहा कि अगर महिला को वर्क फ्रॉम होम की अनुमति मिल जाती, तो यह घटना टल सकती थी। इसी आधार पर कंपनी पर 2.25 करोड़ डॉलर (करीब ₹200 करोड़) का जुर्माना लगाया गया।
अमेरिका में नियम
- Pregnant Workers Fairness Act (PWFA): कंपनियों को प्रेग्नेंट महिलाओं को जरूरी सुविधा देना अनिवार्य
- Pregnancy Discrimination Act (PDA): प्रेग्नेंसी के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता
- Americans with Disabilities Act (ADA): गंभीर स्वास्थ्य स्थिति में अतिरिक्त मदद जरूरी
इन कानूनों के तहत कंपनियों को “reasonable accommodation” देना होता है, जिसमें WFH भी शामिल हो सकता है।
भारत में क्या है नियम?
भारत में Maternity Benefit Act, 1961 के तहत:
- 26 हफ्ते की पेड छुट्टी मिलती है
- नौकरी से नहीं निकाला जा सकता
- WFH वैकल्पिक सुविधा है (अनिवार्य नहीं)
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह मामला सिर्फ एक कंपनी या कर्मचारी का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में वर्कप्लेस पॉलिसी और महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा है। कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि कंपनियों को कर्मचारियों की हेल्थ और स्थिति को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
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