न्यूज़ वाणी | अनुरुद्ध मिश्र, संवाददाता, बाराबंकी
बाराबंकी। देवा शरीफ में सूफी संत हजरत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर आयोजित होने वाले ऐतिहासिक मेले को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। करीब 15 दिनों तक चलने वाले इस मेले को व्यवस्थित और भव्य बनाने के लिए संबंधित विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। मेले में देश-विदेश से बड़ी संख्या में जायरीनों और श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
मेले के दौरान दरगाह पर जियारत के साथ कव्वाली, मुशायरा, धार्मिक आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र रहेंगे। इसके अलावा विभिन्न प्रकार की दुकानें और मनोरंजन के साधन भी मेले की रौनक बढ़ाएंगे।
प्रेम और इंसानियत का संदेश देती है देवा शरीफ की दरगाह
देवा शरीफ की पहचान सूफी संत हजरत हाजी वारिस अली शाह की शिक्षाओं और उनकी रूहानी विरासत से जुड़ी है। वर्ष 1817 में जन्मे हाजी वारिस अली शाह ने अपने जीवन में प्रेम, इंसानियत, आपसी भाईचारे और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का संदेश दिया। वर्ष 1905 में उनके विसाल के बाद भी उनकी शिक्षाएं लोगों को सद्भाव और एकता की प्रेरणा देती हैं।
उनकी दरगाह आज भी विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। यहां आने वाले जायरीन जियारत के साथ उनके विचारों और शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हैं।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है ऐतिहासिक मेला
देवा शरीफ का मेला धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। यहां अलग-अलग धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग एक साथ पहुंचते हैं और आपसी प्रेम तथा भाईचारे की मिसाल पेश करते हैं।
मेले में आयोजित होने वाली कव्वाली और मुशायरे की महफिलें लोगों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से क्षेत्र की साझा विरासत और परंपराओं की झलक भी देखने को मिलती है।
साफ-सफाई, पेयजल और सुरक्षा व्यवस्था पर जोर
मेले में आने वाले जायरीनों और श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए साफ-सफाई, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा सहित जरूरी इंतजाम किए जा रहे हैं। अधिकारियों का प्रयास है कि मेले में आने वाले लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े और पूरा आयोजन व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो।
देवा शरीफ का ऐतिहासिक मेला उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, सूफी परंपरा, प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इस आयोजन से न केवल धार्मिक आस्था को बढ़ावा मिलता है, बल्कि सामाजिक एकता और साझा संस्कृति का संदेश भी लोगों तक पहुंचता है।
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