वॉशिंगटन। अमेरिका ने ईरान की आर्थिक गतिविधियों पर शिकंजा कसते हुए पांच अहम क्षेत्रों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग सेक्टर शामिल हैं। अमेरिका का उद्देश्य इन क्षेत्रों के जरिए ईरान की आय और अंतरराष्ट्रीय कारोबार को सीमित करना है।
अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ प्रतिबंधित कारोबार करने वाले दूसरे देशों और विदेशी कंपनियों पर भी कार्रवाई हो सकती है। इसके तहत सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जाने का खतरा है। ऐसी स्थिति में संबंधित कंपनियों के लिए अमेरिकी बैंकिंग और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच मुश्किल हो सकती है।
अमेरिका ने ईरान के इन 5 क्षेत्रों को बनाया निशाना
अमेरिका के नए प्रतिबंधों के दायरे में डिजिटल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन तथा शिपिंग सेक्टर शामिल हैं। इन क्षेत्रों को ईरान की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों और कमाई के महत्वपूर्ण माध्यमों के तौर पर देखा जाता है।
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू किया है। उनके मुताबिक ईरान के सामने अब दुनिया से आर्थिक रूप से अलग-थलग पड़ने या वैश्विक अर्थव्यवस्था में दोबारा शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ाने का विकल्प है।
ईरान से कारोबार करने वाले देशों पर भी बढ़ेगा दबाव
अमेरिका के सेकेंडरी प्रतिबंधों की सबसे बड़ी चिंता उन विदेशी कंपनियों के लिए है, जो ईरान के साथ कारोबार करती हैं। यदि कोई कंपनी अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाली गतिविधियों में शामिल होती है, तो उसके खिलाफ भी अमेरिकी कार्रवाई हो सकती है।
प्रतिबंध लगने की स्थिति में अमेरिकी बैंकों और कंपनियों के साथ कारोबार प्रभावित होने के साथ-साथ डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम से बचने के लिए ईरान से कारोबार सीमित कर सकती हैं।
चीन, तुर्की और UAE पर भी नजर
ईरान के प्रमुख कारोबारी साझेदारों में चीन, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। हालांकि अमेरिका ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि किन देशों या कंपनियों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
1. तेल आयात पर असर: ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाली भारतीय कंपनियों के लिए भुगतान और व्यापारिक व्यवस्था मुश्किल हो सकती है।
2. चाबहार पोर्ट: ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत की रणनीतिक और कारोबारी दिलचस्पी है। नए प्रतिबंध इस परियोजना से जुड़ी गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।
3. डॉलर में लेन-देन: ईरान से जुड़े भारतीय कारोबार पर अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंध लगने की स्थिति में डॉलर में भुगतान करना कठिन हो सकता है।
4. भारतीय कंपनियों पर दबाव: ईरान के साथ कारोबार करने वाली कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों और नियमों का पालन करने के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।
5. कूटनीतिक दबाव: अमेरिका भारत से ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने की मांग कर सकता है। हालांकि, भारत अपने ऊर्जा हितों और रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर फैसला करेगा।
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