नई दिल्ली। भारतीय सेना की एंटी-टैंक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम खरीदने की तैयारी है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के मुताबिक, इस सौदे के लिए भारतीय सेना की ओर से लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LOA) पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं।
इमरजेंसी खरीद प्रक्रिया के तहत भारत करीब 60 जैवलिन मिसाइल सिस्टम खरीद सकता है। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 292 करोड़ रुपये बताई जा रही है। मिसाइलों की डिलीवरी दिसंबर से शुरू होने की संभावना है। इसके साथ ही दोनों देश भविष्य में जैवलिन सिस्टम का उत्पादन भारत में करने की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं।
कंधे से लॉन्च की जा सकती है जैवलिन मिसाइल
जैवलिन एक मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है, जिसे सैनिक कंधे से लॉन्च कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से दुश्मन के टैंक, बख्तरबंद वाहनों और अन्य मजबूत सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।
इस मिसाइल की प्रमुख विशेषता इसकी ‘फायर एंड फॉरगेट’ तकनीक है। लक्ष्य पर लॉक किए जाने के बाद मिसाइल को दागने वाले सैनिक को लगातार उसका मार्गदर्शन करने की जरूरत नहीं होती। मिसाइल अपने सेंसर की मदद से लक्ष्य को ट्रैक करते हुए आगे बढ़ती है।
करीब 4 किलोमीटर तक की प्रभावी रेंज
जैवलिन मिसाइल सिस्टम की रेंज करीब 4 किलोमीटर बताई जाती है। इसमें इन्फ्रारेड सीकर तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे यह दिन और रात में लक्ष्य को पहचानने और ट्रैक करने में सक्षम होती है।
इसका टॉप-अटैक मोड इसकी खासियतों में शामिल है। इस मोड में मिसाइल लक्ष्य के ऊपर से हमला करती है, जहां कई बख्तरबंद वाहनों का कवच अपेक्षाकृत कमजोर होता है। आवश्यकता के अनुसार इसे डायरेक्ट-अटैक मोड में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में बढ़ेगी क्षमता
जैवलिन जैसे पोर्टेबल एंटी-टैंक सिस्टम भारतीय सेना के लिए विशेष रूप से कठिन पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में उपयोगी हो सकते हैं। छोटे सैन्य दल भी इन्हें अपेक्षाकृत आसानी से तैनात कर बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं।
जैवलिन सिस्टम को अमेरिकी कंपनियों लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन के संयुक्त उद्यम ने विकसित किया है। भारत लंबे समय से इस मिसाइल सिस्टम में रुचि रखता रहा है। तकनीक हस्तांतरण से जुड़े मुद्दों के कारण पहले इसकी खरीद आगे नहीं बढ़ सकी थी।
भारत ने बाद में इजराइल की स्पाइक मिसाइलों और स्वदेशी एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों पर भी ध्यान दिया। अब जैवलिन की संभावित खरीद से भारतीय सेना की एंटी-आर्मर क्षमता में एक और महत्वपूर्ण विकल्प जुड़ सकता है।
भारत में निर्माण की भी संभावना
जैवलिन सिस्टम की खरीद के साथ भारत और अमेरिका इसके भविष्य में भारत में निर्माण की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं। यदि स्थानीय उत्पादन की दिशा में सहमति बनती है तो इससे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी बढ़ावा मिल सकता है।
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