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“मशीन ने मरा बताया, सिस्टम बना बेबस: 6 माह की गर्भवती को न इलाज मिला न दवा, पति बोला– हम गिड़गिड़ाते रहे, सचिव हंसते रहे”

मेरी पत्नी सामने खड़ी थी, लेकिन मशीन कह रही थी- वो मर चुकी है।: ये किसी फिल्म का डायलॉग नहीं, बल्कि भारत के डिजिटल सिस्टम की सच्चाई है, जहां एक जिंदा, गर्भवती महिला को कागजों में मार दिया गया… और सिस्टम ने कहा- अब इसे जिंदा साबित करो। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो के इकलगांव का है। दिहाड़ी मजदूर मंगलदीन रैकवार अपनी पत्नी गीता की जिंदगी नहीं, बल्कि उसका अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। छह महीने की गर्भवती गीता (35) सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दी गई है। अब उसे न इलाज मिल रहा है और न दवाएं। न ही किसी सरकारी योजना का लाभ। उसने रविवार को बमीठा थाने में भी शिकायत की है। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर बड़ा सवाल है जो मशीन को भगवान और इंसान को गलती मान बैठा है।  खजुराहो से करीब 30 किलोमीटर दूर इकलगांव पहुंची। यहां पीड़ित परिवार और परियोजना अधिकारी से बात की।

पढ़िए रिपोर्ट…

‘मौत’ की खबर ने उजाड़ दी खुशियां: मंगलदीन रैकवार मजदूरी कर हर दिन कुछ रुपए जोड़ रहा था, ताकि गीता सुरक्षित मां बन सके, लेकिन 28 दिसंबर को एक मशीन ने सब कुछ बदल दिया। उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन लेने गए मंगलदीन से ऑपरेटर ने अंगूठा लगवाया। स्क्रीन पर लाल अक्षरों में लिखा उभरा… “Aadhaar Suspended: Person is Deceased (मृत)”। मृत्यु के कारण आधार निष्क्रिय कर दिया गया है। आधार संबंधी जानकारी प्राप्त करने में विफल रहे घर जाओ।यानी गीता इस दुनिया में कागजों के मुताबिक मर चुकी थी। मैसेज पढ़कर मंगलदीन के पैरों तले जमीन खिसक गई। पत्नी सामने खड़ी थी, सांस ले रही थी… और सिस्टम कह रहा था– वो जिंदा नहीं है

बोली- बच्चे को कुछ हुआ तो सिस्टम जिम्मेदार:  गीता सुबकते हुए कहती है– मेरे पेट में 6 महीने का बच्चा पल रहा है। बच्चे को कुछ हुआ, तो उसकी मौत की जिम्मेदारी ये सिस्टम लेगा? आधार सस्पेंड होते ही गीता का बैंक खाता नहीं खुल पा रहा। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर कहते हैं– “आधार नहीं तो इलाज नहीं।”

पंचायत सचिव हंसे, बेबसी का मजाक उड़ा : सबसे शर्मनाक चेहरा तब सामने आया, जब परिवार ग्राम पंचायत पहुंचा। गीता की सास रामप्यारी रैकवार ने रोते हुए बताया, “जब हम पंचायत सचिव रमेश प्रजापति के पास मदद मांगने गए, तो उन्होंने हमारी बेबसी का मजाक उड़ाया। वे हंसते हुए बोले कि सरकारी रिकॉर्ड गलत नहीं होता। हम रोने लगे कि हमारी बहू जिंदा है, उसे मरा हुआ मत कहो।” इतना ही नहीं, गांव के कुछ लोग भी अब इस परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।

देवर कोमल ने बताया, “राह चलते लोग मजाक उड़ाते हैं कि तुम्हारी बहू तो ‘भूत’ है, वो तो मर चुकी है। हमें घर से निकलने में शर्म आने लगी है। गर्भवती को कैसे दिल्ली-भोपाल तक लेकर जाएं मंगलदीन ने बताया कि जनसेवा केंद्र, ब्लॉक कार्यालय, आधार सेंटर के चक्कर काट रहे हैं। हर जगह से एक ही जवाब मिलता है– “ये मामला हमारे लेवल का नहीं है।” अब सवाल ये है कि दिहाड़ी मजदूर एक गर्भवती महिला को लेकर दिल्ली-भोपाल के चक्कर कैसे काटे? हताश होकर हमने बमीठा थाने में शिकायत दी है। मांग सिर्फ एक है– गीता को कागजों में दोबारा जिंदा किया जाए, ताकि उसे इलाज और मातृत्व लाभ मिल सके।

परियोजना अधिकारी बोलीं- जांच करवाती हूं

राजनगर परियोजना अधिकारी रजनी शुक्ला का कहना है कि मामले की जांच कराई जाएगी और आंगनवाड़ी के जरिए गीता के जीवित होने का प्रमाणीकरण कराया जाएगा। इसके बाद इलाज में दिक्कत नहीं आएगी।

अधिकारी से लिखित शिकायत करने की सलाह: वकील अरुण उपाध्याय ने बताया कि कागजी गलती के कारण गीता रैकवार को गलत तरीके से मृत घोषित कर दिया गया, जिससे उनका आधार कार्ड सस्पेंड हो गया और उन्हें सरकारी योजनाओं व स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने समाधान के लिए छतरपुर कलेक्ट्रेट में स्थित ई-गवर्नेंस जिला अधिकारी से लिखित शिकायत करने की सलाह दी है, जिसके बाद मामला भोपाल स्थित UIDAI क्षेत्रीय कार्यालय को भेजा जाएगा और आधार फिर से सक्रिय किया जाएगा। यह प्रक्रिया करीब 15 दिन में पूरी हो सकती है, क्योंकि ऐसी बड़ी त्रुटि स्थानीय आधार केंद्रों पर ठीक नहीं होती।

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