वॉशिंगटन/तेहरान। पश्चिम एशिया में पिछले चार महीनों से जारी तनाव और सैन्य टकराव अब एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है, जिसने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए कूटनीतिक प्रयास अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके हैं। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी ने हालात को और गंभीर बना दिया है। लगातार हो रही सैन्य गतिविधियों, कड़े राजनीतिक बयानों और रणनीतिक तैयारियों के बीच वैश्विक स्तर पर आशंका जताई जा रही है कि यदि समय रहते तनाव कम नहीं हुआ तो इसका असर पूरे विश्व की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया लगातार संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। क्षेत्र में विभिन्न सैन्य अभियानों, जवाबी कार्रवाइयों और राजनीतिक तनाव ने पहले ही हालात को जटिल बना दिया था। अब अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव इस संकट को और गहरा करता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ सख्त बयान दिए जा रहे हैं, जबकि सुरक्षा एजेंसियां संभावित परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
जानकारों का कहना है कि शांति वार्ता और संघर्ष विराम के लिए कई देशों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को सर्वोपरि बताते हुए पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहे हैं। इससे क्षेत्र में अस्थिरता लगातार बढ़ती जा रही है।
अमेरिका लंबे समय से पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक हितों और सहयोगी देशों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता रहा है। दूसरी ओर, ईरान भी क्षेत्रीय प्रभाव और अपनी सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर किसी प्रकार का समझौता करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास लगातार गहराता जा रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार, अंतरराष्ट्रीय बाजार और कच्चे तेल की कीमतों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। भारत सहित तेल आयात पर निर्भर कई देशों के लिए भी यह स्थिति आर्थिक चुनौती बन सकती है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए विश्व समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती तनाव को नियंत्रित करने की है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई वैश्विक मंच लगातार संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं। हालांकि अब तक इन अपीलों का अपेक्षित प्रभाव दिखाई नहीं दिया है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता देखी जा रही है। निवेशक संभावित संकट को लेकर सतर्क हैं और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े बाजारों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है। यदि संघर्ष और बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक समय में किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का प्रभाव केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा बाजार, निवेश और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है। यही वजह है कि दुनिया के कई देश लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं।
भारत ने भी समय-समय पर संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है। विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि भारत की प्राथमिकता क्षेत्र में शांति बनाए रखने और अपने नागरिकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की होगी। पश्चिम एशिया में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक कार्यरत हैं और भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
इस बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अमेरिका और ईरान की आगामी रणनीति पर टिकी हैं। यदि दोनों देशों के बीच बातचीत की नई पहल होती है तो तनाव कम होने की संभावना बन सकती है। वहीं यदि सैन्य गतिविधियां और तेज होती हैं तो स्थिति और अधिक गंभीर रूप ले सकती है।
हालांकि सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर “तीसरे विश्व युद्ध” जैसी आशंकाओं को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं, लेकिन फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि विश्व व्यापक युद्ध की स्थिति में पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति निश्चित रूप से गंभीर है, लेकिन भविष्य की दिशा दोनों देशों के राजनीतिक और कूटनीतिक निर्णयों पर निर्भर करेगी।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर पश्चिम एशिया के बदलते घटनाक्रम पर है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के कदम ही तय करेंगे कि क्षेत्र में तनाव कम होगा या संघर्ष का दायरा और व्यापक रूप लेगा।
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