कोलकाता. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे आने के बाद राज्य में राजनीतिक घमासान चरम पर है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद भाजपा और टीएमसी के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. बीते बंगाल चुनाव में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की है, जिसके बाद दोनों दलों के नेता आमने-सामने हैं. इस विवाद की मुख्य वजह अभिषेक बनर्जी द्वारा चुनाव प्रचार और उसके बाद इस्तेमाल की गई तीखी भाषा है. अभिषेक बनर्जी ने एक रैली में ‘गुजराती गैंग’ का जिक्र किया था, जिसका सीधा इशारा पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तरफ था. अब उसी बयान पर एफआईआर दर्ज हुआ है. ऐसे में बड़ा सवाल क्या अभिषेक बनर्जी का बयान उन्हें जेल तक पहुंचाएगा? क्या अभिषेक बनर्जी गिरफ्तार होंगे?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब चुनाव आयोग ने अप्रैल में हुई चुनावी हिंसा और धांधली की शिकायतों के बाद फाल्टा विधानसभा सीट के सभी 285 मतदान केंद्रों पर दोबारा मतदान (Re-polling) कराने का आदेश दिया. इस फैसले पर भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने तंज कसते हुए कहा कि टीएमसी का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ अब ढह चुका है. इस पर पलटवार करते हुए अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर तीखा पोस्ट लिखा. उन्होंने भाजपा और चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए कहा, “तुम्हारी ‘बांग्ला विरोधी गुजराती गैंग’ और उनके प्यादे ज्ञानेश कुमार (चुनाव आयुक्त) दस जन्मों में भी मेरे डायमंड हार्बर मॉडल पर एक खरोंच तक नहीं लगा सकते. तुम्हारे पास जो कुछ भी है, सब लगा दो. मैं पूरी भारत सरकार को चुनौती देता हूं, फाल्टा आओ.

बनर्जी ने कहा था बीजेपी अपने सबसे मजबूत नेताओं को भेजो, दिल्ली से किसी गॉडफादर को भेजो. अगर हिम्मत है तो फाल्टा में मुकाबला करो.’ उनके इसी ‘गुजराती गैंग’ और चुनाव आयोग के अधिकारियों को ‘प्यादा’ बताने वाले बयान को लेकर भाजपा ने आपत्ति जताई और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई.
नेताओं के तीखे बाण: इस मामले पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद राहुल सिन्हा ने अभिषेक बनर्जी पर कड़ा हमला बोला है. राहुल सिन्हा ने कहा, “अभिक बनर्जी ने चुनाव से पहले और चुनाव के बाद जिस तरह की अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया, उसी के कारण उनके खिलाफ यह एफआईआर दर्ज की गई है. इस पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. अगर वह चुनाव परिणामों से निराश हैं, तो उन्हें बाहर आकर जहर उगलने के बजाय घर पर बैठकर शोक मनाना चाहिए.”
टीएमसी ने क्या कहा?: दूसरी तरफ, टीएमसी सांसद डोला सेन ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए न्यायपालिका और जनता पर भरोसा जताया है. डोला सेन ने कहा, “अंतिम फैसला हमेशा न्याय, सच्चाई और जनता के हाथ में होता है. इसलिए, हमें पूरा विश्वास है कि इस मामले में भी आखिरी फैसला सच्चाई, न्याय और आम जनता के पक्ष में ही आएगा.” टीएमसी का आरोप है कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों और कानूनी तंत्र का दुरुपयोग कर रही है.
ममता बनर्जी 15 साल तक पश्चिम बंगाल की सीएम रही.क्या चुनावी भाषणों पर दर्ज हो सकती है FIR? जानिए कानूनी पक्ष: इस घमासान के बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनावी भाषणों पर एफआईआर दर्ज हो सकती है? कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इसका जवाब ‘हां’ है. देश में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार असीमित नहीं है और चुनावी मंचों पर भी नेताओं को मर्यादा में रहना होता है.
आदर्श आचार संहिता (MCC): चुनाव के दौरान कोई भी नेता जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर नफरत या वैमनस्य फैलाने वाले बयान नहीं दे सकता. उल्लंघन पर चुनाव आयोग प्रचार पर रोक लगा सकता है या नोटिस दे सकता है.
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: इस कानून की धारा 123 के तहत चुनाव के दौरान विभिन्न वर्गों के बीच भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर नफरत बढ़ाना एक ‘भ्रष्ट आचरण’ (Corrupt Practice) है, जिससे चुनाव रद्द भी हो सकता है.
भारतीय न्याय संहिता (BNS): यदि भाषण में क्षेत्रीय या भाषाई आधार पर दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने या संवैधानिक संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग) को अपमानित करने का प्रयास किया जाता है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत सीधे आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है.
अभिषेक बनर्जी के मामले में ‘गुजराती गैंग’ जैसे शब्दों का प्रयोग क्षेत्रीय वैमनस्य और संवैधानिक संस्थाओं के अपमान के दायरे में आ सकता है, जिसके कारण कानूनी तौर पर एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह वैध है. राजनीतिक रूप से यह भले ही दो दलों की लड़ाई हो, लेकिन कानूनी तौर पर यह चुनावी सुचिता का गंभीर मामला है.
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