वो अपने झूठ को भी सच बनाए बैठे हैं
हम अपने किरदार को आईना बनाए बैठे हैं
वक़्त ने छीन लिए कितने ही उजाले फिर भी
हम अपनी आँखों में कई ख़्वाब सजाए बैठे हैं
जो चेहरे में कई चेहरे छुपाकर रखते हैं
हम उन्हें ही अपने दिल में बसाए बैठे हैं
ये जो महफ़िल में बड़े साफ़ नज़र आते हैं
हम उनके राज़ ज़माने से छुपाए बैठे हैं
जो उजालों के दुश्मन रहे हैं मुद्दतों से
हम उनकी बज़्म में शमा जलाए बैठे हैं
*सुल्तान ए. गहलोत*
कवि एवं अध्यापक
पूर्व छात्र, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़, (उ.प्र.)
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