रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने रेल यात्रियों के अधिकारों और रेलवे की जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रेन से गिरकर हुई यात्री की मौत को ‘अनुचित घटना’ (Untoward Incident) माना है। अदालत ने मृतक के परिजनों को आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश देते हुए रेलवे दावा अधिकरण (आरसीटी), रांची बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मुआवजे का दावा खारिज कर दिया गया था।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने सुनाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि कोई वैध टिकटधारी यात्री यात्रा के दौरान ट्रेन से गिरकर अपनी जान गंवा देता है और उसके विपरीत कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी घटना को रेलवे अधिनियम के तहत ‘अनुचित घटना’ माना जाएगा। ऐसे मामलों में मृतक के आश्रित मुआवजे के हकदार हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह दलील दी गई कि मृतक नियमित रूप से रेल यात्रा कर रहा था और यात्रा के दौरान दुर्घटनावश ट्रेन से गिरने के कारण उसकी मौत हो गई थी। इसके बावजूद रेलवे दावा अधिकरण ने यह कहते हुए मुआवजे का दावा खारिज कर दिया था कि प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर रेलवे की जिम्मेदारी सिद्ध नहीं होती।
हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड, उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अधिकरण के निर्णय को गलत ठहराया। अदालत ने कहा कि केवल संदेह या अनुमान के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। यदि यह साबित होता है कि मृतक एक वैध रेल यात्री था और उसकी मृत्यु यात्रा के दौरान हुई दुर्घटना में हुई है, तो रेलवे अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उसके आश्रितों को निर्धारित मुआवजा दिया जाना चाहिए।
अदालत ने अपने फैसले में रेलवे अधिनियम और इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए विभिन्न निर्णयों का भी उल्लेख किया। हाई कोर्ट ने कहा कि रेल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की जिम्मेदारी है और दुर्घटनावश ट्रेन से गिरने की घटनाओं को कानून के अनुसार देखा जाना चाहिए।
न्यायालय ने रेलवे को निर्देश दिया कि मृतक के परिजनों को आठ लाख रुपये का वैधानिक मुआवजा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उपलब्ध कराया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे दावा अधिकरण द्वारा मुआवजा देने से इनकार करने का निर्णय विधिसम्मत नहीं था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला रेल दुर्घटना से जुड़े मुआवजा मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि यदि कोई यात्री वैध टिकट के साथ यात्रा कर रहा हो और यात्रा के दौरान दुर्घटनावश उसकी मृत्यु हो जाए, तो उसके आश्रितों को केवल तकनीकी आधारों पर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
रेलवे दावा अधिकरण का गठन रेल दुर्घटनाओं, यात्रा के दौरान मृत्यु या चोट तथा अन्य संबंधित मामलों में मुआवजे के दावों के त्वरित निस्तारण के लिए किया गया है। हालांकि कई मामलों में दावेदारों को राहत के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। ऐसे में झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य में समान मामलों की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ माना जा सकता है।
इस निर्णय के साथ हाई कोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल तकनीकी पहलुओं पर निर्णय देना नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों को कानून के अनुरूप न्याय दिलाना भी है। अदालत के इस आदेश से मृतक के परिजनों को आर्थिक राहत मिलेगी, वहीं रेल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर भी एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश गया है।
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