नई दिल्ली। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयोग की भूमिका, परीक्षा व्यवस्था और देश की प्रशासनिक व्यवस्था में होने वाले बदलावों पर बात की। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लिए जिस तरह की गवर्नेंस की जरूरत है, उसमें UPSC की भूमिका महत्वपूर्ण है।
प्रधानमंत्री ने गुरुवार को भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में UPSC से जुड़े 100 ऐतिहासिक फैसलों पर आधारित पुस्तक का विमोचन किया। इसके साथ ही शताब्दी स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने UPSC की 100 वर्षों की यात्रा से जुड़ी प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया।
‘नेशन फर्स्ट’ और ‘सिटिजन्स फर्स्ट’ पर जोर
प्रधानमंत्री ने कहा कि UPSC के माध्यम से चयनित होने वाले युवा भविष्य में देश की प्रशासनिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में उम्मीदवारों के चयन के दौरान दो मूल भावनाओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने ‘नेशन फर्स्ट’ और ‘सिटिजन्स फर्स्ट’ को प्रमुख कसौटी बताया। उनके अनुसार प्रशासनिक अधिकारियों में देशहित के साथ-साथ आम नागरिकों की समस्याओं और जरूरतों को समझने की क्षमता भी होनी चाहिए।
100 साल में बदला आयोग का स्वरूप
UPSC की यात्रा करीब एक सदी पुरानी है। इस दौरान देश की शासन व्यवस्था, तकनीक, परीक्षा प्रणाली और पाठ्यक्रम में कई बदलाव हुए, लेकिन आयोग की संवैधानिक भूमिका बनी रही।
आयोग के इतिहास में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए। इसकी स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी और शुरुआती दौर में इसके अध्यक्ष के रूप में सर रॉस बार्कर ने जिम्मेदारी संभाली थी। समय के साथ संस्था के नाम और स्वरूप में भी बदलाव हुए।
आज UPSC इंजीनियरिंग, मेडिकल, रक्षा और विभिन्न केंद्रीय सेवाओं से जुड़ी कई प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन करता है।
सुभाष चंद्र बोस का भी किया जिक्र
प्रधानमंत्री ने UPSC की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी परीक्षा प्रक्रिया का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि उस दौर में भारतीय सिविल सेवा यानी ICS की परीक्षा व्यवस्था अलग थी और उसमें संस्कृत सहित विभिन्न विषयों की परीक्षा होती थी।
उन्होंने कहा कि UPSC की पुरानी यात्रा को देखने से यह समझ आता है कि समय के साथ परीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में किस तरह बदलाव आया है।
‘प्रो पीपल और प्रो एक्टिव’ गवर्नेंस पर जोर
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज प्रशासन का उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं और नियमों को लागू करना नहीं, बल्कि नागरिकों की जरूरतों को केंद्र में रखकर काम करना है।
उन्होंने प्रो पीपल, प्रो एक्टिव और गुड गवर्नेंस को आधुनिक प्रशासन के महत्वपूर्ण आधारों के रूप में बताया। उनके मुताबिक अधिकारियों को समस्याएं सामने आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय संभावित समस्याओं को पहले से समझकर समाधान की तैयारी करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सेवाओं में ऐसे पेशेवरों की जरूरत है, जो गरीब और कमजोर वर्ग की समस्याओं को समझ सकें, नई परिस्थितियों के अनुसार समाधान खोज सकें और लोगों का जीवन आसान बनाने के लिए काम करें।
UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों की क्षमता बढ़ाने पर जोर
प्रधानमंत्री ने UPSC के साथ-साथ राज्य लोक सेवा आयोगों की कार्यक्षमता बढ़ाने की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया को आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण से मजबूत किया जाना चाहिए।
उन्होंने मिशन कर्मयोगी के तहत विकसित iGOT प्लेटफॉर्म का उपयोग आयोगों की आंतरिक व्यवस्था और कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने के लिए किए जाने की बात कही।
समय पर परीक्षा कराने की जरूरत
प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसका सीधा संबंध लाखों युवाओं के भविष्य से होता है। परीक्षा या परिणाम में अनावश्यक देरी से अभ्यर्थियों को आगे की पढ़ाई और करियर को लेकर परेशानी हो सकती है।
उन्होंने परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं से समयबद्धता और लगातार सुधार पर ध्यान देने की अपील की।
हर साल लाखों युवा UPSC की परीक्षाओं में होते हैं शामिल
UPSC देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं में से एक है। संविधान के अनुच्छेद 315 में संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों का प्रावधान किया गया है।
UPSC की विभिन्न परीक्षाओं में हर वर्ष लाखों अभ्यर्थी शामिल होते हैं। सिविल सेवा परीक्षा देश की सबसे चर्चित प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक है। इसके अलावा आयोग इंजीनियरिंग, मेडिकल, रक्षा और अन्य केंद्रीय सेवाओं से संबंधित भर्ती परीक्षाएं भी आयोजित करता है।
परीक्षा प्रक्रिया में अभ्यर्थियों की पहचान को गोपनीय रखने के लिए उत्तर पुस्तिकाओं में कोडिंग जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इससे मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान परीक्षक के सामने उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान सीमित रहती है।
UPSC की परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठते रहे हैं सवाल
UPSC की लंबी यात्रा के साथ परीक्षा व्यवस्था और चयन प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं। इनमें उम्मीदवारों के प्रमाणपत्रों की जांच, परीक्षा के पाठ्यक्रम और भाषा से जुड़े मुद्दे तथा परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे विषय शामिल हैं।
दिव्यांगता और अन्य आरक्षण संबंधी प्रमाणपत्रों की जांच को लेकर भी विवाद सामने आ चुके हैं। इसके अलावा CSAT की कठिनाई, हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में प्रश्नों के अनुवाद तथा उत्तर-कुंजी और कटऑफ जारी करने की प्रक्रिया को लेकर अभ्यर्थी समय-समय पर अपनी चिंताएं सामने रखते रहे हैं।
लेटरल एंट्री को लेकर भी प्रशासनिक सेवाओं में चयन, अनुभव, मेरिट और आरक्षण व्यवस्था से संबंधित बहस होती रही है।
दो दिवसीय शताब्दी समारोह में जुटे विशेषज्ञ
UPSC का शताब्दी समारोह 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को आयोजित किया गया। पहले दिन भारत मंडपम में ‘शताब्दी समारोह-मंथन’ कार्यक्रम के तहत विभिन्न विषयों पर चर्चा और पैनल आयोजित किए गए।
इस आयोजन में राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य, वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद और UPSC से जुड़े अधिकारी शामिल हुए। 100 वर्ष पूरे होने का यह आयोजन आयोग की ऐतिहासिक यात्रा के साथ-साथ भविष्य की परीक्षा और चयन प्रणाली पर चर्चा का भी अवसर बना।
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