तेल अवीव। इजराइल में होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता बरकरार रहती है या विपक्ष सरकार बनाने में कामयाब होता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। हालांकि, राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव के बावजूद फिलिस्तीनियों की स्थिति में बड़े सुधार की उम्मीद कम दिखाई दे रही है।
इसकी प्रमुख वजह इजराइल की राजनीति में फिलिस्तीन को अलग देश बनाने के मुद्दे पर व्यापक सहमति का अभाव है। नेतन्याहू का विरोध करने वाली कई पार्टियां भी फिलिस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के गठन का खुलकर समर्थन नहीं करती हैं। ऐसे में चुनावी नतीजों से फिलिस्तीनियों के भविष्य पर कितना असर पड़ेगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
फिलिस्तीन के मुद्दे पर इजराइल की राजनीति में बदलाव
इजराइल की राजनीति में लंबे समय तक वामपंथी और दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच फिलिस्तीन विवाद को लेकर स्पष्ट अंतर दिखाई देता था। वामपंथी दल बातचीत, आपसी समझौते और दो अलग देशों के समाधान की वकालत करते थे। दूसरी ओर, दक्षिणपंथी पार्टियां फिलिस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के गठन का विरोध करती रही हैं और कब्जे वाले क्षेत्रों में यहूदी बस्तियों के विस्तार का समर्थन करती रही हैं।
लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध ने इजराइल की राजनीतिक बहस को काफी हद तक बदल दिया। सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई से जुड़े मुद्दे प्रमुख हो गए, जबकि फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने की मांग करने वाले राजनीतिक दलों का प्रभाव सीमित नजर आने लगा।
गठबंधन की राजनीति से तय होती है सरकार
इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना होता है। इसी वजह से चुनाव के बाद छोटी पार्टियां भी सरकार गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
नवंबर 2022 के चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। इसके बाद दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के समर्थन से 64 सीटों वाला गठबंधन तैयार किया गया। इस सरकार में धार्मिक और राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टियों का प्रभाव काफी मजबूत रहा।
बेजालेल स्मोट्रिच और इतमार बेन ग्विर जैसे नेताओं ने कब्जे वाले क्षेत्रों में इजराइल की पकड़ मजबूत करने तथा यहूदी बस्तियों के विस्तार की वकालत की है। इन नेताओं की नीतियों ने इजराइल और फिलिस्तीन के बीच विवाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस तेज की है।
विपक्ष में भी फिलिस्तीन को लेकर एकमत नहीं
इजराइल का विपक्ष कई विचारधाराओं वाली पार्टियों से मिलकर बना है। यायर लापिड की येश अतिद और बेनी गैंट्ज से जुड़ी राजनीतिक ताकतें अपेक्षाकृत मध्यमार्गी मानी जाती हैं, जबकि कुछ विपक्षी दल दक्षिणपंथी विचारधारा के करीब हैं।
वहीं, वामपंथी दलों का राजनीतिक प्रभाव पहले की तुलना में सीमित हुआ है। फिलिस्तीन विवाद के समाधान के लिए दो स्वतंत्र देशों की स्थापना का समर्थन करने वाली आवाजों को भी घरेलू राजनीति में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इस स्थिति में केवल नेतन्याहू के विरोध के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि नई सरकार फिलिस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के गठन की दिशा में बड़ा कदम उठाएगी।
अरब पार्टियों की भूमिका भी अहम
इजराइल में अरब नेतृत्व वाली पार्टियां वहां के फिलिस्तीनी नागरिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन दलों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन वे फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर इजराइली कब्जे का विरोध करती रही हैं।
मंसूर अब्बास की पार्टी राम ने 2021 में इजराइल की गठबंधन सरकार में शामिल होकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उदाहरण पेश किया था। हालांकि, सरकार गठन में अरब दलों की भूमिका इस बात पर निर्भर करती है कि चुनाव के बाद किस गठबंधन को बहुमत मिलता है और दूसरी पार्टियां उनके समर्थन को किस हद तक स्वीकार करती हैं।
चुनाव के बाद फिलिस्तीनियों के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
इजराइल के चुनाव में सरकार बदलना अपने आप में फिलिस्तीन विवाद का समाधान नहीं है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, सुरक्षा से जुड़े सवालों पर सहमति, कब्जे वाले क्षेत्रों की स्थिति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की संभावनाओं पर ठोस बातचीत जरूरी होगी।
यदि नई सरकार भी फिलिस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र के गठन को प्राथमिकता नहीं देती, तो सत्ता परिवर्तन के बावजूद फिलिस्तीनियों के लिए हालात बदलना कठिन रह सकता है। ऐसे में इजराइल के चुनाव का महत्व केवल सरकार बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देखना होगा कि नई राजनीतिक व्यवस्था शांति वार्ता और दो-राष्ट्र समाधान को कितनी जगह देती है।
निष्कर्ष: इजराइल में चुनावी मुकाबला चाहे जिस दिशा में जाए, फिलिस्तीनियों के भविष्य का सवाल केवल प्रधानमंत्री बदलने से हल नहीं होगा। वास्तविक बदलाव के लिए स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र, सुरक्षा और स्थायी शांति पर ठोस राजनीतिक सहमति जरूरी है।
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