बंगाल एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख एक हते बढ़ाने का फैसला सुनाया है। मैं नफीस जाफरी आपको यह बता दूं कि इससे पहले बंगाल एसआईआर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केंद्र सरकार की दलीलें सुनी। सुप्रीम कोर्ट ने कई तल्ख सवाल
भी पूछे। चुनाव आयोग ने दलील दी कि उन्हें एसआईआर के लिए सक्षम अधिकारी नहीं मिले। वहीं, केंद्र सरकार ने कहा कि ऐसा संदेश जाना चाहिए कि संविधान सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होता है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि
पश्चिम बंगाल एसआईआर प्रक्रिया को आसान बनाने और जताई गई चिंताओं का ध्यान रखने के लिए हम निम्नलिखित अंतरिम निर्देश जारी करते हैं। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते दिनों बंगाल में चल रहे एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर खुद दलीलें दी। बतौर मुख्यमंत्री सर्वाेच्च अदालत में दलीलें देने के कारण उनकी खूब चर्चा हुईं। लेकिन अब ममता बनर्जी के सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर बहस करने के खिलाफ कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। अखिल भारत हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने यह याचिका दाखिल की थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को फटकार लगाई है। सीजेआई सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता से कहा मामले का राजनीतिकरण ना करें। इसमें अनसुनी क्या बात है? ये हमारे संविधान में आस्था और भरोसे को दिखाता है। सीजेआई ने दो-टूक कहा कि इस मामले में कोई ऐसी अनसुनी बात नहीं कि कोर्ट को दखल देना पड़े। यह हमारे संविधान में भरोसे को दिखाता है। मालूम हो कि पश्चिम बंगाल के एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत उपस्थिति को चुनौती देते हुए एक हस्तक्षेप आवेदन दायर किया गया था। पिछले सप्ताह ममता बनर्जी स्वयं अदालत में पेश हुई थीं और एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली अपनी याचिका पर दलीलें दी थीं। उनके कोर्ट में दलीलें देने पर अखिल भारत हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने याचिका दाखिल करते हुए इसे अनुचित बताया था। अर्जी में कहा गया है कि अनुच्छेद 32 के तहत दायर कार्यवाही में किसी पदासीन मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत रूप से पेश होना संवैधानिक रूप से अनुचित, संस्थागत रूप से अवांछनीय और कानूनी रूप से अस्थिर है। याचिकाकर्ता के अनुसार,
एसआईआर से जुड़े मुद्दे व्यक्तिगत विवाद नहीं बल्कि राज्य शासन और चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों से संबंधित हैं, इसलिए मुख्यमंत्री व्यक्तिगत क्षमता में पेश होने का दावा नहीं कर सकतीं। आवेदन में कहा गया है कि राज्य पहले से ही नियुक्त वरिष्ठ वकीलों के माध्यम से प्रतिनिधित्व कर रहा है, ऐसे में मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत उपस्थिति न्यायिक परंपराओं और स्थापित प्रथा के विपरीत है। उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे मामलों को वकीलों के जरिए आगे बढ़ाएं, ताकि संवैधानिक अदालतों की गरिमा, निष्पक्षता और स्वतंत्रता बनी रहे। अर्जी में यह भी कहा गया है कि किसी पदासीन मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत उपस्थिति से प्रतीकात्मक
दबाव या संस्थागत असंतुलन की आशंका पैदा हो सकती है, जो शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित करती है। साथ ही, याचिका के सुनवाई योग्य होने पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि मुख्यमंत्री बिना अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के अनुच्छेद 32 के तहत चुनाव आयोग के खिलाफ याचिका दायर नहीं कर सकतीं। आवेदन में पश्चिम बंगाल में एसआईआर की आवश्यकता का भी उल्लेख किया गया है। वहीं दूसरी ओर इससे पहले इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पेश होने और बहस को रिकॉर्ड पर लिया। चार फरवरी को ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुई थी। सीजेआई सूर्य कांत ने फैसला लिखाते हुए कहा- 4 फरवरी को ममता बनर्जी अपने वकीलों के साथ अदालत में पेश हुईं। चुनाव आयोग द्वारा माइक्रो ऑब्जर्वर की तैनाती पर आपत्ति जताई गई थी। आयोग ने कहा था कि बार-बार अनुरोध के बावजूद राज्य सरकार ने पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध नहीं कराई।

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