इजराइल की राजनीति में चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन को लेकर हलचल तेज हो गई है। देश में नई सरकार के गठन की संभावनाओं को लेकर राजनीतिक नेताओं के बीच बैठकों और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। इसी क्रम में विपक्षी नेता गादी आइजनकोट ने तीन विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर राजनीतिक रणनीति और भविष्य की सरकार के गठन को लेकर चर्चा की।
आइजनकोट की इन मुलाकातों को विपक्षी दलों के बीच तालमेल बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इन बैठकों का उद्देश्य विपक्षी दलों के बीच साझा रणनीति तैयार करना और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार के विकल्प पर सहमति बनाना है।
मुलाकात के दौरान आइजनकोट ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लिकुड पार्टी और नेतन्याहू चुनाव परिणामों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें चुनौती देने के लिए अभियान चला रहे हैं। आइजनकोट ने चुनाव की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करने की भी अपील की।
विपक्षी नेताओं के बीच बढ़ी बातचीत
29 अक्टूबर को विपक्षी खेमे में कई महत्वपूर्ण बैठकें हुईं। गादी आइजनकोट ने पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट से मुलाकात की। इसके अलावा विपक्षी नेता यायर गोलान ने यायर लैपिड और आइजनकोट के साथ अलग-अलग बैठकें कीं। इन चर्चाओं में जल्द से जल्द नई सरकार बनाने और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा रास्ता निकालने पर विचार किया गया।
यायर गोलान ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से विपक्षी एकजुटता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश के भविष्य को बेहतर बनाने और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव लाने के लिए सभी सहयोगियों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
चुनाव में किसी भी गठबंधन को नहीं मिला स्पष्ट बहुमत
इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के बाद राजनीतिक तस्वीर काफी दिलचस्प हो गई है। 120 सदस्यों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। चुनाव के बाद सामने आए आंकड़ों के अनुसार नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें प्राप्त हुई हैं।
वहीं, अरब दलों को 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया है। ऐसे में किसी भी गठबंधन के लिए सरकार बनाने का रास्ता आसान नहीं है। विपक्षी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचने के लिए अरब दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
अरब दलों के समर्थन पर फंसा पेच
सरकार गठन की प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती अरब दलों के समर्थन को लेकर सामने आ रही है। विपक्षी खेमे के कई नेता अरब दलों के साथ औपचारिक गठबंधन बनाने को लेकर सहमत नहीं दिखाई दे रहे हैं। वहीं, कुछ नेताओं का मानना है कि नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने के लिए बाहरी समर्थन का विकल्प तलाशा जा सकता है।
अरब दलों के नेता मंसूर अब्बास ने भी संकेत दिया है कि आइजनकोट के नेतृत्व में अल्पमत सरकार बनाना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर, अविगदोर लिबरमैन ने नेतन्याहू और अरब दलों के साथ सरकार बनाने के विकल्पों से दूरी बनाए रखने की बात कही है।
चुनाव में गड़बड़ी के आरोपों की जांच जारी
चुनाव परिणाम सामने आने के बाद कुछ मतदान केंद्रों पर कथित अनियमितताओं और विदेशी हस्तक्षेप को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं। हालांकि, चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि अभी तक मतदान की पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से प्रभावित किए जाने का कोई आधार सामने नहीं आया है।
इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट इन आरोपों से जुड़े मामलों की जांच कर रही है। आइजनकोट ने भी जांच पूरी होने तक राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि किसी तरह का विदेशी हस्तक्षेप हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन इसके आधार पर पूरे चुनाव परिणाम पर सवाल खड़े करना उचित नहीं है।
नई सरकार के सामने होंगी कई बड़ी चुनौतियां
गादी आइजनकोट ने नई संसद के गठन के बाद कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम शुरू करने की तैयारी भी जताई है। इनमें सभी नागरिकों के लिए सैन्य और राष्ट्रीय सेवा से जुड़ा कानून, 7 अक्टूबर 2023 के हमले की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग का गठन और सरकारी बजट व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं।
आइजनकोट ने कहा है कि नई संसद की कार्यवाही शुरू होने के बाद इन मुद्दों पर विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इजराइल की नई संसद का शपथ ग्रहण 10 नवंबर को निर्धारित है।
फिलहाल इजराइल की राजनीति में सरकार गठन को लेकर बातचीत जारी है। राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया के बाद उन्हें राजनीतिक दलों के नेताओं से परामर्श कर सरकार बनाने के लिए उपयुक्त उम्मीदवार को आमंत्रित करना होगा। यदि कोई भी दल या गठबंधन बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता है तो देश में एक बार फिर चुनाव कराने की स्थिति बन सकती है।
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