संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने अमेरिका के साथ हाल ही में हुई ट्रेड डील पर अपनी बात रखी। मै नफीस जाफरी आपको यह बता दूं कि उन्होंने कहा कि यह समझौता भारत के हितों के अनुरूप नहीं है और कई अहम मुद्दों पर सही तरीके से बात नहीं की गई। बिना किसी प्रत्यक्ष आरोप के, उन्होंने इसे एक “मिस्ड
अवसर” के रूप में पेश किया और कहा कि भारत को अपने संसाधनों और क्षमता के आधार पर मज़बूत स्थिति से बातचीत करनी चाहिए थी। तो वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर जारी अपनी फैक्टशीट में बड़े बदलाव किए हैं। सिर्फ 24 घंटों के भीतर व्हाइट हाउस ने उन अहम बिंदुओं में बदलाव किया है जिन्हें पहले डील का हिस्सा बताया गया था। फैक्टशीट से दालों पर शुल्क कम करने वाला दावा हटाया गया, जबकि 500 अरब डॉलर की खरीद पर भी भाषा नरम कर दी गई है। . डिजिटल टैक्स जैसे मुद्दे, जो भारत के लिए संवेदनशील माने जाते हैं, अब संशोधित दस्तावेज़ में अलग तरह से पेश हुए हैं। इन बदलावों के बाद यह साफ दिख रहा है कि बातचीत की टेबल पर भारत की आपत्तियों का असर अमेरिकी दस्तावेज़ में भी दिखाई देने लगा है। पहले जारी संस्करण में दावा किया गया था कि भारत “कुछ दालों” पर शुल्क कम करेगा, लेकिन अपडेटेड फैक्टशीट में इस दावे को पूरी तरह हटा दिया गया है। इसके अलावा 500 अरब डॉलर की खरीद से जुड़ी भाषा में भी बदलाव किया गया। यह कदम इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि दालों का आयात भारत के . क्षेत्र के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है। व्हाइट हाउस ने जारी अपने शुरुआती दस्तावेज़ में कहा था कि भारत अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और खाद्य.. उत्पादों की एक लंबी सूची पर शुल्क घटाएगा या खत्म करेगा। इस सूची में सूखे अनाज, रेड ज्वार, ट्री नट्स, ताज़ा और प्रोसेस्ड फल, “कुछ दालें”, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स (शराब) शामिल थे। लेकिन संशोधित फैक्टशीट में “दालें” पूरी तरह गायब हैं। अब दस्तावेज़ में सिर्फ यह कहा गया है कि भारत अमेरिकी औद्योगिक और खाद्य-. उत्पादों पर शुल्क कम करेगा, जिनमें रेड ज्वार, ट्री नट्स, फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स शामिल हैं। भारत दुनिया में दालों (मसूर, चना, सूखी फलियां) का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। भारतीय किसानों को नुकसान से बचाने के लिए भारत लंबे समय से अमेरिकी दालों पर ऊंचा आयात-शुल्क लगाता आया है। फैक्टशीट में बदलाव यह संकेत देता है कि भारत ने इस बिंदु पर अपनी आपत्ति साफ तौर पर रखी। संशोधित दस्तावेज़ में एक और अहम बदलाव यह है कि अमेरिका ने . उत्पादों का उल्लेख हटा दिया है। पहले कहा गया था कि भारत 500 अरब डॉलर से अधिक के ऊर्जा, सूचना व संचार प्रौद्योगिकी, कोयला और अन्य अमेरिकी उत्पाद खरीदेगा। नई फैक्टशीट में . शब्द नहीं है और प्रतिबद्ध की जगह इरादा रखता है शब्द लिख दिया गया है। यानी अब दावा यह है कि भारत 500 अरब डॉलर से अधिक के ऊर्जा, कोयला और अन्य उत्पाद खरीदने का “इरादा रखता है”-कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं। भारत का . क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है और राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि भारत अपने किसानों पर दबाव बढ़ने की आशंका के चलते . बाज़ार को पूरी तरह खोलने से बचता आया है। पहले संस्करण में कहा गया था कि भारत डिजिटल सर्विस टैक्स हटाएगा. लेकिन संशोधित फैक्टशीट में यह दावा नहीं है। अब दस्तावेज़ में सिर्फ यह कहा गया है कि भारत डिजिटल व्यापार
(डिजिटल ट्रेड) से जुड़े नियमों पर बातचीत करने के लिए तैयार है।

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