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हिंदी से मेरा रिश्ता: एक विषय से कहीं अधिक — सुल्तान अली गहलोत

किसी भाषा से हमारा रिश्ता केवल इतना ही नहीं होता कि हम उसमें बोलते या लिखते हैं, बल्कि भाषा हमारे भीतर बहुत पहले से मौजूद होती है। हमारे पहले तुतलाते शब्दों में बचपन की स्मृतियों में घर की बातचीत में, लोकगीतों में, रिश्तों की आत्मीयता में और उन भावनाओं में जिन्हें हम किसी दूसरी भाषा में व्यक्त करने से पहले अपनी मातृभाषा में महसूस करते हैं। मेरे लिए हिंदी ऐसी ही भाषा है। हिंदी मेरे लिए केवल एक विषय नहीं, बल्कि मेरी पहचान, मेरी संवेदना और मेरे आत्मविश्वास का हिस्सा है। हर वर्ष 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस मनाते हैं। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में हिंदी दिवस मनाया जाता है। लेकिन मेरे लिए हिंदी दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं है। यह उस भाषा को याद करने और उसके प्रति अपने रिश्ते को फिर से महसूस करने का अवसर है, जिसने मुझे सोचने, समझने और अपने विचारों को शब्द देने की दृष्टि दी।
मुझे आज भी याद है, जब मेरा दाख़िला जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में बी.ए. हिंदी (ऑनर्स) में हुआ था। मैं बहुत उत्साहित था। अपने पसंदीदा विषय को उच्च शिक्षा के रूप में पढ़ने का अवसर मेरे लिए खुशी की बात थी। लेकिन जब कुछ लोगों को पता चला कि मैं अपने गाँव से इतनी दूर आकर हिंदी से स्नातक कर रहा हूँ, तो उन्होंने कुछ इस तरह सवाल किया—“इतनी दूर आकर बी.ए. कर रहे हो और वह भी हिंदी से? किसी दूसरे कोर्स में दाख़िला ले सकते थे।”
शायद उनके लिए हिंदी विषय करियर की दृष्टि से कोई बहुत आकर्षक विकल्प नहीं था। उस समय मैंने भी उस बात पर कोई बहस करना ज़रूरी नहीं समझा। बस मुस्कुराकर इतना ही कहा—“आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे हम अमेरिका या इंग्लैंड में खड़े हों। भाई, मैं भारत में पैदा हुआ हूँ। हिंदी मेरी मातृभाषा है और मुझे अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करने का अवसर मिल रहा है, तो मैं किसी दूसरे कोर्स में क्यों जाऊँ?” इतना कहकर मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया। उस समय शायद मेरे पास अपने निर्णय को सही साबित करने के लिए बहुत सारे तर्क नहीं थे, लेकिन एक बात मुझे अच्छी तरह मालूम थी कि मैं क्या कर रहा हूँ। आज, इतने वर्षों के बाद, जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अपने उस निर्णय पर मुझे कोई पछतावा नहीं, बल्कि गर्व महसूस होता है। हिंदी का विद्यार्थी होना मेरे लिए कभी कमतर होने की बात नहीं रही। बल्कि समय के साथ यह एहसास और गहरा हुआ कि अपनी भाषा को समझना दरअसल अपने समाज, अपनी संस्कृति और स्वयं को समझने की दिशा में बढ़ना है।
मेरे परिवार के अधिकांश लोगों ने हिंदी से ही परास्नातक किया है। इसे आप इत्तेफ़ाक कह सकते हैं या हिंदी से लगाव, लेकिन हिंदी हमारे परिवार का हिस्सा रही है। शायद इसी वातावरण ने मेरे भीतर भी हिंदी के प्रति एक स्वाभाविक आत्मीयता पैदा की। लेकिन मेरे लिए हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह मेरे परिवार की भाषा है। हिंदी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें मुझे अपने मन की बात कहने में एक सहजता महसूस होती है। मेरा मानना है कि हम जिस भाषा में बचपन से सोचते और महसूस करते हैं, उसमें अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने की एक अलग ही सहजता होती है। मातृभाषा में कही गई बात कई बार केवल कानों तक नहीं पहुँचती, सीधे मन तक उतर जाती है। अपनी मातृभाषा में व्यक्ति अपने अनुभवों को जिस स्वाभाविकता और आत्मीयता के साथ व्यक्त कर सकता है, वह किसी दूसरी भाषा में नहीं कर सकता।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपनी भाषा के महत्व को कितनी स्पष्टता से रेखांकित किया है—
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥”
इन पंक्तियों में अपनी भाषा के ज्ञान को व्यक्ति और समाज की उन्नति से जोड़ा गया है। मुझे लगता है कि आज भी इन शब्दों की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना, उसमें ज्ञान अर्जित करना और उसमें अपने विचारों को अभिव्यक्त करना किसी पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि दूसरी भाषाएँ हमारे लिए कम महत्वपूर्ण हैं। बल्कि मेरा मानना है कि हमें हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं का ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। दूसरी भाषाएँ हमें नए समाजों, संस्कृतियों और विचारों से परिचित कराती हैं। जितनी भाषाएँ हम सीखते हैं, उतना ही हमारा संसार विस्तृत होता जाता है। बस आवश्यकता इस बात की है कि दूसरी भाषाएँ सीखते हुए अपनी भाषा से हमारा संबंध कमज़ोर न हो।
इसी विचार को भारतेंदु की ये पंक्तियाँ आगे बढ़ाती हैं:
“विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार॥”

अर्थात् दुनिया के विभिन्न देशों और भाषाओं से ज्ञान ग्रहण किया जाए, लेकिन उस ज्ञान को अपनी भाषा में भी विकसित और प्रसारित किया जाए। मेरे विचार से आज के समय में यही सबसे संतुलित भाषाई दृष्टि है। हमें दुनिया से जुड़ना है, दूसरी भाषाएँ सीखनी हैं, उनसे ज्ञान लेना है, लेकिन अपनी भाषा को पीछे छोड़कर नहीं। भारत जैसे बहुभाषी देश में तो यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारी भाषाएँ हमारी विविधता की पहचान हैं और यही विविधता भारत को भारत बनाती है। हिंदी को अपनाते हुए हमें दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं का भी सम्मान करना चाहिए। अंग्रेज़ी जानना अच्छी बात है, उर्दू जानना अच्छी बात है, संस्कृत, बंगाली, तमिल, मराठी, पंजाबी या किसी भी दूसरी भाषाओं का भी हमें ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि कोई भी भाषा किसी मनुष्य की श्रेष्ठता या हीनता का पैमाना नहीं हो सकती।
अल्लामा इक़बाल की प्रसिद्ध पंक्तियाँ भी इसी साझा भारतीयता और सौहार्द की भावना को बहुत ख़ूबसूरती से व्यक्त करती हैं:

“मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।”

इन पंक्तियों का व्यापक संदेश हमें यह याद दिलाता है कि हमारी विविध पहचानें हमें एक-दूसरे से दूर करने के लिए नहीं हैं। भाषा भी मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का माध्यम है। हिंदी से प्रेम करते हुए उर्दू का सम्मान किया जा सकता है, अंग्रेज़ी सीखी जा सकती है और भारत की तमाम भाषाओं के प्रति आत्मीयता रखी जा सकती है। यही हमारी बहुलता की ख़ूबसूरती है।
हिंदी की सुंदरता उसकी व्यापकता और विविधता में भी है। इसकी अनेक उपभाषाओं और बोलियों ने हिंदी के संसार को समृद्ध बनाया है। हिंदी का संसार केवल किताबों में नहीं, बल्कि गांवों की चौपालों, लोकगीतों, कहावतों, मुहावरों और रोज़मर्रा के जीवन में भी दिखाई देता है। हिंदी साहित्य ने भी भारतीय समाज और मनुष्य की संवेदनाओं को व्यापक स्वर दिया है। कबीर और तुलसी से लेकर प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा, दिनकर और आगे की पीढ़ियों तक हिंदी साहित्य ने समय के साथ बदलते भारत को शब्द दिए हैं। हिंदी की शक्ति केवल इस बात में नहीं है कि उसे कितने लोग बोलते हैं, बल्कि इस बात में भी है कि उसने कितने अनुभवों और कितनी आवाजों को अपने भीतर जगह दी है। आज हिंदी दुनिया की प्रमुख भाषाओं में से एक है और भारत की सीमाओं से बाहर भी बड़ी संख्या में लोग हिंदी बोलते, समझते और सीखते हैं। डिजिटल दुनिया, सिनेमा, टेलीविज़न और सोशल मीडिया ने हिंदी की पहुँच को और व्यापक बनाया है। लेकिन किसी भाषा का भविष्य केवल उसके बोलने वालों की संख्या से तय नहीं होता। भाषा तब जीवित और समृद्ध रहती है, जब उसकी नई पीढ़ी उसमें पढ़ती है, लिखती है, सोचती है और नए विचारों को जन्म देती है।

हर वर्ष हिंदी दिवस पर हम हिंदी के महत्व की चर्चा करते हैं। सरकारी कार्यालयों में कार्यक्रम होते हैं, प्रतियोगिताएँ होती हैं, भाषण दिए जाते हैं और हिंदी के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। यह सब अपनी जगह आवश्यक है, लेकिन हिंदी का भविष्य केवल इन आयोजनों से ही सुरक्षित नहीं होगा। बल्कि हिंदी आगे तब बढ़ेगी जब हम उसे अपने रोज़मर्रा के जीवन में उसे सम्मान देंगे, हिंदी में अच्छी किताबें पढ़ेंगे, गंभीर लेखन को प्रोत्साहित करेंगे और नई पीढ़ी को हिंदी में नए विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित करेंगे। हमें हिंदी को केवल अतीत की भाषा बनाकर नहीं रखना है। उसे वर्तमान की ज़रूरतों और भविष्य की। संभावनाओं से जोड़ना है। हिंदी को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, इंटरनेट और बदलती दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना होगा। तभी हिंदी केवल भावनाओं की भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान और विचार की भाषा के रूप में भी और मज़बूत होगी। आज इतने वर्षों बाद जब मैं अपने विद्यार्थी जीवन को याद करता हूँ, तो उस दिन का वह सवाल भी याद आता है—“हिंदी से ही क्यों?” अब शायद मेरे पास उसका जवाब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है। क्योंकि हिंदी मेरे लिए केवल पढ़ने का विषय नहीं थी; यह मेरी जड़ों से जुड़ने और अपनी पहचान को समझने का माध्यम थी। जामिया में हिंदी का विद्यार्थी बनने का निर्णय मेरे जीवन के उन निर्णयों में से एक है, जिसे याद करते हुए आज भी संतोष होता है। मैंने हिंदी को केवल एक विषय के रूप में नहीं पढ़ा; उसके माध्यम से साहित्य को समझा, समाज को देखा और मनुष्य की संवेदनाओं को शब्दों के स्तर पर महसूस किया। आज मुझे हिंदी का विद्यार्थी होने पर गर्व है। लेकिन मेरा यह गर्व किसी दूसरी भाषा को छोटा करने वाला गर्व नहीं है। मैं हिंदी को अपनाने के साथ-साथ दूसरी भाषाओं का सम्मान करने में भी विश्वास रखता हूँ। क्योंकि अंततः भाषा का उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना है। हमें हिंदी को अपनाना है, दूसरी भाषाओं का सम्मान करना है और भाषाओं के नाम पर खड़ी होने वाली दीवारों को गिराना है। क्योंकि भाषाएँ हमें बाँटती नहीं हैं, वे हमें जोड़ती हैं।

सुल्तान अली गहलोत
बेस्ट टीचर अवॉर्डी एवं लेखक
पूर्व छात्र, जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली

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