वाराणसी। उत्तर प्रदेश एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) ने वाराणसी के रामनगर क्षेत्र में रविवार तड़के हुई मुठभेड़ में 30 लाख रुपये के इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह को मार गिराने का दावा किया है। वह झारखंड के प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) से जुड़ा था और लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की तलाश में था।
ATS के मुताबिक, रविवार सुबह करीब 4 बजे सूचना मिली थी कि बृजेश गंझू रामनगर के रास्ते मुगलसराय की ओर जाने वाला है। सूचना के आधार पर ATS कमांडो ने इलाके में घेराबंदी की। इसी दौरान वह एक अन्य व्यक्ति के साथ बाइक से वहां पहुंचा।
पुलिस के अनुसार, टीम ने उसे रुकने का इशारा किया। आरोप है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए उसने पिस्टल से ATS टीम पर फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान DSP विपिन राय और हेड कॉन्स्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर गोली लगी। इसके बाद ATS ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें बृजेश घायल होकर सड़क पर गिर गया।
घायल बृजेश को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उसका साथी मौके से फरार हो गया। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर तलाशी अभियान चलाया और फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए।
दो पिस्टल और कारतूस बरामद
ATS ने मौके से दो पिस्टल, कई जिंदा कारतूस और खोखे बरामद किए हैं। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में रखवाया है। कार्रवाई के बाद रामनगर और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
8 साल से NIA को थी तलाश
बृजेश गंझू पर झारखंड सरकार और NIA की ओर से कुल 30 लाख रुपये का इनाम घोषित था। वह टेरर फंडिंग से जुड़े मामले में NIA की वांछित सूची में था। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, उसके खिलाफ चतरा जिले में ही 39 मामले दर्ज थे। लंबे समय से वह अलग-अलग नाम और ठिकाने बदलकर रह रहा था।
बृजेश पर आरोप था कि वह ट्रांसपोर्टरों, कोयला खनन कंपनियों और ठेकेदारों से वसूली करता था। कोयला परियोजनाओं के विस्तार के बाद उसकी गतिविधियों का नेटवर्क खनन क्षेत्र में भी बढ़ा।
कई नामों से दर्ज था रिकॉर्ड
पुलिस रिकॉर्ड में बृजेश के नाम गोपाल सिंह भोक्ता, दुलारचंद गंझू, रंजन, फुलचंद गंझू और सरदार समेत कई अन्य नाम दर्ज बताए गए हैं। वह मूल रूप से झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र का रहने वाला था।
बताया जाता है कि वर्ष 2004 में उसने भाकपा माओवादी संगठन से अलग होकर अपना गुट बनाया था। इसके बाद उसने झारखंड के चतरा, रांची और हजारीबाग समेत कई इलाकों में नेटवर्क तैयार किया। उसका प्रभाव बिहार के कुछ हिस्सों तक भी बताया जाता है। वर्ष 2010 में वह लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया चुना गया था।
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