नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे के बीच संगठन को लेकर विवाद गहरा गया है। अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े आयोग ने ट्रंप प्रशासन से RSS के सदस्यों पर लक्षित प्रतिबंध लगाने और मोहन भागवत का अमेरिकी वीजा रद्द करने की सिफारिश की है। आयोग की ओर से भविष्य में भागवत के अमेरिका प्रवेश पर रोक लगाने की मांग भी सामने आई है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब मोहन भागवत अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के दौरे पर हैं। अमेरिका में उनके कार्यक्रम को लेकर विरोध और समर्थन, दोनों देखने को मिल रहे हैं। न्यूयॉर्क में प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर कुछ संगठनों ने आपत्ति जताई है, जबकि बड़ी संख्या में हिंदू अमेरिकी संगठन कार्यक्रम के समर्थन में सामने आए हैं।
अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग का आरोप है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मामलों में RSS की भूमिका और संगठन से जुड़े लोगों पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। इसी आधार पर आयोग ने RSS से जुड़े लोगों पर लक्षित प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है।
हालांकि, इन सिफारिशों का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया है। USCIRF की सिफारिशें बाध्यकारी आदेश नहीं हैं और अंतिम कार्रवाई अमेरिकी सरकार के संबंधित विभागों के अधिकार क्षेत्र में आती है। अभी तक ट्रंप प्रशासन की ओर से RSS पर प्रतिबंध लगाने का कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
भारत सरकार ने अमेरिकी आयोग की टिप्पणियों को पक्षपातपूर्ण बताते हुए खारिज किया है। विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि ऐसे बयानों में भारत की स्थिति को गलत तरीके से पेश किया गया है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद भारत-अमेरिका संबंधों और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
इस मामले पर भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं ने अमेरिकी आयोग की सिफारिशों को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया है। उनका कहना है कि किसी विदेशी संस्था को भारत के सामाजिक और राजनीतिक संगठनों पर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों और स्थानीय परिस्थितियों को समझना चाहिए।
वहीं, विपक्षी दलों और कुछ नागरिक संगठनों ने सरकार से धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब देने की मांग की है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठने वाली आपत्तियों को केवल राजनीतिक बयान बताकर खारिज करने के बजाय सरकार को आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा करनी चाहिए।
मोहन भागवत के समर्थकों का कहना है कि उनका विदेश दौरा भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता और प्रवासी भारतीयों से संवाद पर केंद्रित है। समर्थकों के मुताबिक, RSS प्रमुख के कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग शामिल हो रहे हैं और इन आयोजनों का उद्देश्य संगठन की विचारधारा और सामाजिक कार्यों के बारे में जानकारी देना है।
दूसरी ओर, विरोध करने वाले संगठनों का आरोप है कि RSS की विचारधारा को लेकर अमेरिका में रहने वाले कुछ धार्मिक और सामाजिक समूहों के बीच लंबे समय से चिंता बनी हुई है। इन संगठनों ने अमेरिकी प्रशासन से भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अधिक सख्त रुख अपनाने की अपील की है।
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि इस विवाद का असर भारत-अमेरिका संबंधों पर तत्काल पड़ने की संभावना कम है, लेकिन इससे दोनों देशों के बीच मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर मतभेद जरूर उजागर हुए हैं। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक, रक्षा और व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं, ऐसे में दोनों पक्ष इस विवाद को व्यापक द्विपक्षीय रिश्तों से अलग रखने की कोशिश कर सकते हैं।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी आयोग की सिफारिशों पर ट्रंप प्रशासन क्या रुख अपनाता है। यदि अमेरिकी सरकार इन सिफारिशों पर विचार करती है, तो RSS से जुड़े लोगों पर संभावित प्रतिबंध, वीजा नीति और भारत-अमेरिका कूटनीतिक संवाद को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है। वहीं, यदि प्रशासन इन मांगों को स्वीकार नहीं करता है, तो यह मामला आयोग और अमेरिकी सरकार के बीच मतभेद के रूप में भी सामने आ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम पर RSS या मोहन भागवत की ओर से अमेरिकी वीजा रद्द करने की मांग को लेकर अंतिम और विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है। आने वाले दिनों में भागवत के विदेश दौरे, प्रस्तावित कार्यक्रमों और अमेरिकी प्रशासन के रुख से इस विवाद की दिशा और स्पष्ट हो सकती है।
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