अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव और बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। नए प्रतिबंध अभियान के तहत ईरान की वित्तीय व्यवस्था, तेल कारोबार, शिपिंग, तकनीकी आपूर्ति और विदेशी मुद्रा के स्रोतों को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है। खास बात यह है कि अमेरिका का दबाव केवल ईरान तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाले देशों और कंपनियों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रशासन की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा द्वितीयक प्रतिबंध हैं। इनके तहत ईरान के साथ कारोबार जारी रखने वाली विदेशी कंपनियों और संस्थाओं को अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था से बाहर करने का खतरा हो सकता है। इससे चीन, तुर्किये, इराक, यूएई और भारत जैसे देशों के सामने भी व्यापारिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदार कौन?
ईरान अपने आयात के लिए मुख्य रूप से एशियाई और क्षेत्रीय देशों पर निर्भर है। चीन और यूएई उसके सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल हैं। तुर्किये भी साझा सीमा और मजबूत जमीनी व्यापार मार्ग के कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत का ईरान के साथ व्यापार इन देशों की तुलना में छोटा है, लेकिन कृषि उत्पाद, चाय, दवाओं और अन्य जरूरी वस्तुओं के कारोबार के कारण दोनों देशों के संबंध महत्वपूर्ण हैं।
ईरान के निर्यात में चीन की भूमिका सबसे बड़ी है। इसके अलावा इराक, यूएई, तुर्किये, अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी ईरानी सामान, ऊर्जा और अन्य उत्पादों के प्रमुख खरीदार हैं।
भारत पर क्यों बढ़ सकता है असर?
अमेरिकी प्रतिबंधों का भारत पर असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है। सबसे पहले भारतीय कंपनियों के लिए ईरान के साथ भुगतान और कारोबार करना मुश्किल हो सकता है। भारत और ईरान के बीच सीधे बैंकिंग चैनल सीमित होने के कारण व्यापार में तीसरे देशों और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्थाओं की भूमिका अहम रही है। ऐसे में अगर अमेरिका ईरान से जुड़े वित्तीय नेटवर्क पर और सख्ती करता है तो भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
बासमती चावल, चाय, कृषि उत्पाद और दवाओं जैसे क्षेत्रों पर भी असर पड़ने की आशंका है। ईरान भारतीय उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार रहा है और प्रतिबंधों के कारण भुगतान व्यवस्था बाधित होने पर व्यापार की लागत और जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं।
चाबहार बंदरगाह भी बड़ी चिंता
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में चाबहार बंदरगाह भी शामिल है। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए दीर्घकालिक समझौता किया है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक व्यापारिक पहुंच उपलब्ध कराने की रणनीति में अहम है।
अमेरिका की ओर से ईरान पर बढ़ती आर्थिक सख्ती के कारण चाबहार से जुड़े वित्तीय लेनदेन, उपकरणों की खरीद और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से बढ़ेगा खतरा
ईरान पर आर्थिक दबाव का एक बड़ा असर समुद्री व्यापार पर भी पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र में किसी तरह का तनाव बढ़ने पर तेल और गैस की आपूर्ति, समुद्री बीमा तथा माल ढुलाई की लागत प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से पूरा होता है। होर्मुज में तनाव बढ़ने पर कच्चे तेल की कीमतों से लेकर भारतीय कंपनियों की परिवहन लागत तक पर असर पड़ सकता है।
क्या भारत सीधे अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में आएगा?
भारत का ईरान के साथ व्यापार चीन या कुछ क्षेत्रीय देशों जितना बड़ा नहीं है, इसलिए तत्काल व्यापक प्रतिबंधों की संभावना को लेकर स्थिति अलग है। हालांकि, ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर अमेरिकी कार्रवाई का जोखिम मौजूद रह सकता है, खासकर तब जब वे अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले तेल, पेट्रोकेमिकल या वित्तीय नेटवर्क से जुड़ते हैं।
इसलिए भारत के सामने संतुलन की चुनौती है। एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ चाबहार, ऊर्जा, क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार से जुड़े भारत के महत्वपूर्ण हित हैं।
पहले जानें- क्या है अमेरिका का ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट?
ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट अमेरिका का ईरान के खिलाफ चलाया गया एक व्यापक और आक्रामक प्रतिबंध अभियान है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की ओर घोषित इस अभियान का मुख्य मकसद ईरान की सरकार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों और विदेशी मुद्रा से काटना और उसके वित्तीय स्रोतों को खत्म करना है।
1. ईरान के अहम सेक्टर्स को निशाना बनाने की तैयारी
इसके तहत अमेरिका कुछ चुनिंदा देशों, संस्थाओं, शख्सियतों और जहाजों पर प्रतिबंध लगा रहा है। इससे ईरान के जहाज परिवहन, सोने के आयात-निर्यात, उड्डयन सेवा, तकनीकी खरीद नेटवर्क और डिजिटल संपत्ति जैसे प्रमुख वित्तीय-लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों को लक्षित करने की तैयारी की जा रही है।
2. द्वितीयक प्रतिबंधों (सेकेंडरी सैंक्शंस) का दायरा बढ़ेगा
इस ऑपरेशन के तहत द्वितीयक प्रतिबंधों के दायरे को काफी बढ़ा दिया गया है। अमेरिका ने वैश्विक साझेदार देशों को ईरान के वित्तीय बैकचैनलों को बंद करने के लिए सख्त समय सीमा दी है, ऐसा न करने पर उन्हें तत्काल द्वितीयक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। ट्रेजरी सचिव के अनुसार, देशों को ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंध पूरी तरह से काटने होंगे या फिर अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना होगा।
निष्कर्ष: अमेरिका की नई रणनीति का लक्ष्य केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसकी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक और वित्तीय लाइफलाइन को सीमित करना है। यदि द्वितीयक प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ता है तो भारत समेत ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को अपने कारोबार और भुगतान तंत्र को लेकर सावधानी बरतनी पड़ सकती है।
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