नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के बाद सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने आम लोगों की आवाजाही सुनिश्चित करने पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि मेट्रो और यात्री ट्रेनों का संचालन तभी रोका जाना चाहिए, जब कानून-व्यवस्था की स्थिति वास्तव में बिगड़ने का खतरा हो।
इस बीच प्रदर्शन से जुड़े तीन नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को करीब 23 घंटे हिरासत में रखने के बाद रिहा कर दिया गया। तीनों को दिल्ली कैंट स्थित कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया था। रिहाई के लिए उन्हें एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार की शर्त पर 50 हजार रुपये का जमानती मुचलका भरना पड़ा।
प्रदर्शन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिरासत
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को दिल्ली में प्रदर्शन किया गया था। पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान सात हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया। प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोकने के लिए कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी।
प्रदर्शन के चलते राजधानी के कई मेट्रो स्टेशनों को बंद किया गया था। रेलवे सेवाओं पर भी असर पड़ा और बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई। रविवार को मेट्रो स्टेशनों को फिर से खोलने की जानकारी सामने आई, जबकि रेल सेवाएं भी बहाल किए जाने की बात कही गई।
सुप्रीम कोर्ट में नागरिक अधिकारों पर बहस
प्रदर्शनकारियों की हिरासत और पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और एहतियातन हिरासत का इस्तेमाल इस अधिकार को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने बैरिकेड हटाने, मेट्रो सेवाएं बहाल करने और आम लोगों की आवाजाही सामान्य करने की मांग की। एक अधिवक्ता ने पुलिस हिरासत के दौरान कथित मारपीट का आरोप भी लगाया। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही स्थिति स्पष्ट होगी।
तीन नेताओं की रिहाई के लिए रखी गई शर्त
पुलिस के अनुसार, अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 126 और 170 के तहत एहतियातन हिरासत में लिया गया था। आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया।
तीनों नेताओं ने एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार की शर्त पर 50 हजार रुपये का जमानती मुचलका भरा। शर्तों का उल्लंघन होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, इस शर्त का अर्थ यह नहीं है कि वे एक साल तक किसी भी प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले सकते।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आईं। कुछ स्थानों पर पथराव और पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना भी दी गई। वहीं, सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ वीडियो को लेकर भी विवाद हुआ। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन से संबंधित मामलों में कई एफआईआर दर्ज की हैं और मारपीट के वायरल वीडियो के मामले में चार लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई।
प्रदर्शनकारियों की हिरासत, महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग क्यों?
प्रदर्शनकारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त स्पष्टता होनी चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की जा रही है।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पहले कहा गया है कि महत्वपूर्ण फैसले आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। ऐसे में विवाद का केंद्र चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाता अधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही बना हुआ है।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आम नागरिकों की आवाजाही, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठे हैं। आगे की कानूनी कार्रवाई और अदालत के निर्देशों पर इस मामले की दिशा निर्भर करेगी।
News Wani
