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भारत की हिमालयी झीलों पर मंडराया GLOF का खतरा: नेपाल जैसी हो सकती है तबाही; 88 ग्लेशियल झीलें संवेदनशील

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार ने बाढ़ के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों की संख्या 1990 के 107 से बढ़कर 2024 में 669 हो गई। इनमें 88 झीलों को संवेदनशील बताया गया है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे हिमालयी क्षेत्र ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के संभावित खतरे में हैं।

ग्लेशियर तेजी से पिघलने पर उनका पानी पहाड़ों के बीच जमा होकर बड़ी झील का रूप ले लेता है। इन झीलों को अक्सर बर्फ, चट्टान या मलबे से बनी प्राकृतिक दीवार रोककर रखती है। यदि भूस्खलन, हिमस्खलन, तेज गर्मी, अत्यधिक बारिश या प्राकृतिक दबाव के कारण यह बांध अचानक टूट जाए, तो झील का विशाल जलराशि बेहद तेज गति से नीचे की ओर बहने लगती है। इसी घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।

GLOF की खासियत यह है कि इसमें पानी के साथ भारी मात्रा में पत्थर, मलबा और बर्फ भी नीचे की ओर बह सकते हैं। इससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ने के साथ पुल, सड़क, इमारत और जलविद्युत परियोजनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। भारतीय हिमालय में पहले भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 2023 की दक्षिण ल्होनाक झील घटना प्रमुख है।

भारत में GLOF के खतरे को देखते हुए सरकार और वैज्ञानिक संस्थाएं संवेदनशील झीलों तथा जलविद्युत परियोजनाओं की निगरानी पर जोर दे रही हैं। केंद्रीय जल आयोग ने GLOF की आशंका वाले बांधों की बाढ़ संबंधी क्षमता की समीक्षा की है और जोखिम कम करने के लिए हिमालयी राज्यों में परियोजनाएं भी शुरू की गई हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक खतरा केवल झीलों के आकार बढ़ने तक सीमित नहीं है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी के कारण ग्लेशियरों की सतह पर दरारें बढ़ रही हैं और कई इलाकों में बर्फ पिघलने की रफ्तार भी तेज हुई है। इससे पुरानी झीलों का विस्तार होने के साथ नई छोटी झीलें बनने की संभावना बढ़ रही है। कई बार ये झीलें दूरदराज और दुर्गम इलाकों में बनती हैं, जहां समय पर निगरानी और राहत पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होता है।

वैज्ञानिक अब सैटेलाइट तस्वीरों, ड्रोन सर्वे और स्वचालित सेंसर की मदद से ऐसी झीलों की स्थिति पर नजर रख रहे हैं। जलस्तर, झील के किनारों में बदलाव और आसपास की बर्फीली ढलानों की गतिविधियों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है। कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाने की तैयारी भी की जा रही है, ताकि झील का जलस्तर अचानक बढ़ने पर निचले इलाकों को समय रहते अलर्ट किया जा सके।

GLOF का असर केवल प्राकृतिक पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। हिमालयी राज्यों की अर्थव्यवस्था पर्यटन, कृषि, सड़क संपर्क और जलविद्युत उत्पादन पर काफी निर्भर है। अचानक आई बाढ़ से स्थानीय लोगों के घरों और खेतों को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ दूरदराज के गांवों का संपर्क भी टूट सकता है। चारधाम मार्ग, सीमावर्ती सड़कों और नदी घाटियों में बनी परियोजनाएं इस जोखिम के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील मानी जाती हैं।

आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि जोखिम कम करने के लिए केवल बाढ़ आने के बाद राहत कार्य पर्याप्त नहीं होंगे। झीलों की नियमित मैपिंग, खतरे वाले क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों का नियमन, स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षण और सुरक्षित निकासी मार्गों की पहचान जरूरी है। गांवों में सायरन, मोबाइल अलर्ट और सामुदायिक अभ्यास जैसी व्यवस्थाएं मजबूत होने पर जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

स्थानीय लोगों की भूमिका भी इस पूरी व्यवस्था में महत्वपूर्ण है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग मौसम, नदी के बहाव और ढलानों में होने वाले बदलावों को सबसे पहले महसूस करते हैं। यदि उन्हें असामान्य आवाज, पानी के रंग में बदलाव, अचानक जलस्तर बढ़ने या जमीन में दरार जैसे संकेतों की जानकारी दी जाए, तो वे शुरुआती चेतावनी प्रणाली को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी झीलों का बढ़ता आकार आने वाले वर्षों के लिए गंभीर चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। संवेदनशील झीलों की पहचान, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय स्तर पर तैयार आपदा योजना ही GLOF के खतरे से निपटने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकती है।

 

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