नई दिल्ली। देश में 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 ईंधन को लेकर पिछले कुछ समय से जारी बहस के बीच केंद्र सरकार ने एक बार फिर इस ईंधन को सुरक्षित और पर्यावरण के लिए लाभकारी बताया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का कहना है कि ई-20 ईंधन कोई नया प्रयोग नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों में वर्षों से इसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार, भारत में भी चरणबद्ध तरीके से ई-20 ईंधन को लागू किया जा रहा है ताकि आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो, किसानों की आय बढ़े और प्रदूषण में कमी लाई जा सके।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर ई-20 पेट्रोल को लेकर कई तरह की चर्चाएं और सवाल उठाए गए हैं। कुछ वाहन मालिकों ने पुराने वाहनों के इंजन पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई है, जबकि विशेषज्ञों का एक वर्ग भी इस बात पर जोर दे रहा है कि ई-20 ईंधन का उपयोग वाहन निर्माता कंपनियों की तकनीकी सलाह के अनुरूप ही किया जाना चाहिए। इन चर्चाओं के बीच मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ई-20 ईंधन को लेकर भ्रम फैलाने की आवश्यकता नहीं है और इसे वैज्ञानिक परीक्षणों तथा निर्धारित मानकों के आधार पर लागू किया जा रहा है।
मंत्रालय के अनुसार, ब्राज़ील, अमेरिका, कनाडा, थाईलैंड और अन्य कई देशों में लंबे समय से एथनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग किया जा रहा है। विशेष रूप से ब्राज़ील में तो कई वर्षों से अधिक प्रतिशत एथनॉल मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल सफलतापूर्वक हो रहा है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का अध्ययन करने के बाद ही इस नीति को लागू किया गया है।
सरकार का कहना है कि ई-20 कार्यक्रम का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। देश अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी खर्च होता है। यदि पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा बढ़ाई जाती है तो आयातित कच्चे तेल की आवश्यकता कम होगी और इससे देश की अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा। इसके साथ ही घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले एथनॉल के उपयोग से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
एथनॉल मुख्य रूप से गन्ना, मक्का तथा अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। ऐसे में ई-20 कार्यक्रम का सीधा लाभ किसानों को भी मिलने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि एथनॉल उत्पादन बढ़ने से कृषि क्षेत्र को नया बाजार मिलेगा, चीनी मिलों को अतिरिक्त आय के स्रोत प्राप्त होंगे तथा किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की संभावना है।
पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी सरकार ई-20 को महत्वपूर्ण कदम मान रही है। मंत्रालय के अनुसार, एथनॉल मिश्रित ईंधन के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन और कुछ अन्य प्रदूषक तत्वों में कमी लाने में मदद मिल सकती है। भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं की हैं। ऐसे में स्वच्छ ईंधनों को बढ़ावा देना सरकार की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सभी वाहन ई-20 ईंधन के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं हैं। विशेष रूप से पुराने मॉडल के कुछ वाहनों में ईंधन प्रणाली और इंजन की तकनीकी सीमाएं हो सकती हैं। इसलिए वाहन मालिकों को अपने वाहन निर्माता की सलाह और वाहन के उपयोगकर्ता पुस्तिका में दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए। कई प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियां अब ऐसे नए मॉडल बाजार में ला रही हैं जो ई-20 ईंधन के अनुकूल हैं।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि ई-20 ईंधन को देशभर में एक साथ लागू नहीं किया गया, बल्कि चरणबद्ध तरीके से इसकी उपलब्धता बढ़ाई गई है। इसके लिए तेल विपणन कंपनियों ने अपने वितरण नेटवर्क में आवश्यक बदलाव किए हैं और विभिन्न राज्यों में ई-20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक पेट्रोल पंपों पर ई-20 ईंधन उपलब्ध हो सके।
सरकार का कहना है कि एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम पहले भी सफल रहा है। पहले जहां पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा काफी कम थी, वहीं अब इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है। इस अभियान के लिए कृषि, ऊर्जा और उद्योग क्षेत्रों के बीच समन्वित प्रयास किए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ई-20 ईंधन के व्यापक उपयोग के साथ-साथ उपभोक्ताओं को जागरूक करना भी आवश्यक है। उनका कहना है कि वाहन मालिकों को यह जानकारी होना चाहिए कि उनका वाहन ई-20 के अनुकूल है या नहीं। साथ ही, वाहन निर्माताओं और पेट्रोलियम कंपनियों को भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करते रहना चाहिए ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में जैव ईंधनों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होगी। यदि एथनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ती है और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होती है, तो भारत आयातित जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है। इससे ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास को भी गति मिलेगी।
फिलहाल ई-20 ईंधन को लेकर चर्चा जारी है, लेकिन केंद्र सरकार का कहना है कि यह नीति व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी परीक्षण और अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर तैयार की गई है। सरकार का दावा है कि चरणबद्ध तरीके से लागू किए जा रहे इस कार्यक्रम से देश को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय, पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा की बचत जैसे कई क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ मिलने की उम्मीद है।
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