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बांग्लादेश की नई सरकार के बाद बदले कूटनीतिक समीकरण, भारत से उम्मीदों के बीच चीन से बढ़ती नजदीकियों पर बढ़ी चिंता

नई दिल्ली। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार के गठन ने पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। प्रधानमंत्री के रूप में तारिक रहमान के पदभार संभालने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही थी कि भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में नई गर्मजोशी देखने को मिलेगी। दोनों देशों के बीच वर्षों से चले आ रहे रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को नई दिशा मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही थी। हालांकि, नई सरकार के गठन के बाद सामने आए घटनाक्रमों ने संकेत दिए हैं कि ढाका अपनी विदेश नीति को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। इसी दौरान चीन के साथ बढ़ते संपर्क और सहयोग ने भारत समेत क्षेत्रीय रणनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।

भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच साझा इतिहास, संस्कृति, व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे जुड़े हुए हैं। वर्ष 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद से दोनों देशों के बीच समय-समय पर रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों ने कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया है। ऐसे में नई सरकार के गठन के बाद उम्मीद थी कि यह साझेदारी और मजबूत होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नई सरकार बनने के बाद दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर संवाद जारी है, लेकिन अब तक ऐसे बड़े निर्णय सामने नहीं आए हैं, जिनसे यह कहा जा सके कि द्विपक्षीय संबंधों में कोई बड़ा बदलाव आया है। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत जारी है, जबकि कुछ विषयों पर दोनों देशों के बीच मतभेद भी बने हुए हैं।

इसी बीच बांग्लादेश और चीन के बीच बढ़ती आर्थिक एवं रणनीतिक साझेदारी चर्चा का विषय बनी हुई है। चीन पहले से ही बांग्लादेश में आधारभूत संरचना, परिवहन, ऊर्जा, बंदरगाह और औद्योगिक परियोजनाओं में बड़ा निवेश करता रहा है। नई सरकार बनने के बाद भी दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क लगातार जारी हैं। चीन की ओर से निवेश, व्यापार और विकास परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन दक्षिण एशिया में अपनी आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी लगातार मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। इसी रणनीति के तहत वह बांग्लादेश सहित कई पड़ोसी देशों में आधारभूत संरचना और निवेश परियोजनाओं को बढ़ावा दे रहा है। दूसरी ओर बांग्लादेश भी अपने आर्थिक विकास के लिए विभिन्न देशों से निवेश आकर्षित करने की नीति पर आगे बढ़ रहा है।

भारत के लिए बांग्लादेश केवल पड़ोसी देश ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों से संपर्क, सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का महत्वपूर्ण साझेदार भी है। दोनों देशों के बीच हजारों करोड़ रुपये का द्विपक्षीय व्यापार होता है। रेल, सड़क और जलमार्ग संपर्क को भी लगातार मजबूत किया गया है। ऊर्जा क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है।

विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि किसी भी देश का दूसरे देशों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाना सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि जब यह सहयोग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पहुंचता है, तब पड़ोसी देशों की चिंताएं भी बढ़ जाती हैं। यही कारण है कि चीन और बांग्लादेश के बीच बढ़ते सहयोग पर भारत भी लगातार नजर बनाए हुए है।

नई सरकार के सामने घरेलू स्तर पर भी कई चुनौतियां हैं। आर्थिक विकास की गति बनाए रखना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना और राजनीतिक स्थिरता कायम रखना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है। ऐसे में सरकार विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाने की कोशिश कर रही है।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और बांग्लादेश के संबंध इतने व्यापक हैं कि उन्हें केवल किसी एक राजनीतिक घटनाक्रम के आधार पर नहीं आंका जा सकता। दोनों देशों के बीच वर्षों से विकसित संस्थागत सहयोग, सीमा प्रबंधन व्यवस्था, व्यापारिक समझौते और सुरक्षा तंत्र भविष्य में भी संबंधों को मजबूती प्रदान करते रहेंगे।

वहीं दूसरी ओर चीन के साथ बढ़ते आर्थिक संबंधों को लेकर भी बांग्लादेश अपनी विकास आवश्यकताओं का हवाला देता रहा है। ढाका का कहना है कि वह अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप विभिन्न देशों के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है और उसकी विदेश नीति किसी एक देश के पक्ष या विरोध पर आधारित नहीं है।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि आने वाले समय में भारत और बांग्लादेश के संबंध इस बात पर निर्भर करेंगे कि दोनों देश आपसी विश्वास, संवाद और साझा हितों को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं। सीमा प्रबंधन, व्यापार, ऊर्जा, जल बंटवारा, क्षेत्रीय संपर्क और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर निरंतर सहयोग दोनों देशों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण रहेगा।

फिलहाल दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में बांग्लादेश की विदेश नीति पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। एक ओर वह भारत के साथ पारंपरिक संबंधों को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर चीन सहित अन्य देशों के साथ आर्थिक सहयोग भी बढ़ा रहा है। ऐसे में आने वाले महीनों में होने वाली उच्चस्तरीय बैठकों, द्विपक्षीय समझौतों और कूटनीतिक पहल पर यह काफी हद तक निर्भर करेगा कि भारत-बांग्लादेश संबंध किस दिशा में आगे बढ़ते हैं और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है।

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