कानपुर। गणेश चतुर्थी के अवसर पर शहर में गणपति बप्पा के स्वागत की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। घरों से लेकर बड़े-बड़े पंडालों तक भगवान गणेश की आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जा रही हैं। इस बार गणेश प्रतिमाओं में परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी नजर आ रहा है। खास बात यह है कि श्रद्धालुओं के बीच बिना रंग वाली प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग तेजी से बढ़ी है।
मूर्ति बाजार में इस बार भगवान गणेश के कई नए और आकर्षक स्वरूप देखने को मिल रहे हैं। इनमें पगड़ी, मोरपंख, मोतियों, आभूषण और स्टोन वर्क से सजी प्रतिमाएं लोगों को खास तौर पर आकर्षित कर रही हैं। पगड़ी पहने गणपति बप्पा का शाही अंदाज श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
बिना रंग की मिट्टी की प्रतिमाएं बनीं पहली पसंद
पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए कई परिवार रंग-रोगन से मुक्त मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का घर पर ही आसानी से विसर्जन किया जा सकता है।
मूर्ति कलाकारों के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ी है। इस बार खास तौर पर ऐसी मूर्तियों को पसंद किया जा रहा है, जिनमें किसी तरह के रासायनिक रंग का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
पगड़ी, मोरपंख और आभूषणों से सजे बप्पा
गणेश प्रतिमाओं को इस बार अलग रूप देने के लिए कलाकारों ने सजावट पर विशेष ध्यान दिया है। सिंदूरी रंग, आकर्षक पगड़ी, मोरपंख, मोती और आभूषणों से सजी प्रतिमाएं बाजार में लोगों का ध्यान खींच रही हैं।
मुंबई शैली की पगड़ी पहने गणपति की प्रतिमाएं विशेष आकर्षण बनी हुई हैं। कई प्रतिमाओं में भगवान गणेश को पारंपरिक स्वरूप से अलग शाही मुद्रा में सजाया गया है। युवाओं और परिवारों के बीच ऐसी प्रतिमाओं की मांग अधिक देखने को मिल रही है।
कई महीने पहले शुरू हो जाती है प्रतिमाएं बनाने की तैयारी
मूर्ति कलाकार मनोज कुमार दास के मुताबिक गणेश चतुर्थी की तैयारियां कई महीने पहले शुरू हो जाती हैं। कलाकारों और उनके परिवारों द्वारा अलग-अलग डिजाइन की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। श्रद्धालुओं की बदलती पसंद को देखते हुए हर साल नए स्वरूप बाजार में उतारे जाते हैं।
उन्होंने बताया कि इस बार पगड़ी वाले गणपति के साथ प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमाओं को भी खूब पसंद किया जा रहा है। बाजार में प्रतिमाओं की कीमत उनके आकार और डिजाइन के अनुसार अलग-अलग है। छोटी प्रतिमाएं कम कीमत में उपलब्ध हैं, जबकि बड़ी और विशेष डिजाइन वाली प्रतिमाओं की कीमत हजारों रुपये तक पहुंच रही है।
कई वर्षों से घर में स्थापित कर रहे गणपति
गणेश प्रतिमा खरीदने पहुंचे श्रद्धालुओं का कहना है कि उनके परिवारों में कई वर्षों से गणपति स्थापना की परंपरा चली आ रही है। कई परिवार हर साल प्रतिमा के डिजाइन और आकार में बदलाव करते हैं।
श्रद्धालु संजू ने बताया कि वह करीब 10 वर्षों से लगातार घर में भगवान गणेश की स्थापना कर रहे हैं। पहले वह छोटी प्रतिमा लाते थे, लेकिन अब करीब ढाई से तीन फीट या उससे बड़ी प्रतिमा स्थापित करते हैं। उनका कहना है कि गणपति उत्सव उनके लिए आस्था और विश्वास से जुड़ा पर्व है।
वहीं आकृति गर्ग ने बताया कि उनके परिवार में पिछले पांच वर्षों से गणपति स्थापना की जा रही है। इस बार वह सात दिनों तक भगवान गणेश को घर में विराजित करेंगी। उन्हें पगड़ी वाली प्रतिमा विशेष रूप से पसंद आई। पूजा के बाद वह घर पर ही प्रतिमा का विसर्जन करेंगी।
14 सितंबर से शुरू हुआ गणेश उत्सव
कानपुर में 14 सितंबर से गणेश उत्सव की शुरुआत हो गई है। अगले कई दिनों तक शहर में गणपति बप्पा मोरया के जयकारे सुनाई देंगे। घरों और पंडालों में विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाएगी।
श्रद्धालु अपनी परंपरा और मान्यता के अनुसार तीन, पांच, सात या दस दिनों तक गणपति की स्थापना करते हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना और आरती के साथ प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर होगा समापन
गणेश उत्सव का समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। इस अवसर पर शहर के विभिन्न इलाकों में गणपति प्रतिमाओं के विसर्जन की तैयारियां की जाएंगी। श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों और गणपति बप्पा मोरया के जयकारों के बीच प्रतिमाओं को विदाई देंगे।
इस बार कानपुर में गणपति उत्सव के दौरान भव्य सजावट और नए स्वरूप की प्रतिमाओं के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी प्रमुखता से दिखाई दे रहा है। प्राकृतिक मिट्टी की प्रतिमाओं की बढ़ती मांग इसी बदलाव की ओर संकेत कर रही है।
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