मुंबई। हिंदी दिवस के अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं से किसी तरह का प्रतिस्पर्धा का संबंध नहीं है। भारत की भाषाई विविधता ही देश की ताकत है और प्रत्येक भाषा अपने साथ समृद्ध इतिहास, संस्कृति, परंपराएं और लोक जीवन की विरासत लेकर चलती है।
अमित शाह ने विशेष रूप से युवाओं से अपील की कि वे दुनिया की अधिक से अधिक भाषाएं सीखें और वैश्विक स्तर पर संवाद की क्षमता विकसित करें, लेकिन इस दौरान अपनी मातृभाषा को न भूलें। उन्होंने माता-पिता से भी बच्चों के साथ अपनी मातृभाषा में बातचीत करने का आग्रह किया।
गृह मंत्री ने कहा कि अपनी भाषा बोलने में किसी प्रकार की हीन भावना नहीं होनी चाहिए। मातृभाषा व्यक्ति को अपनी मां, मिट्टी, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि भारत की भाषाएं केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि देश की सभ्यता और सामाजिक विविधता की पहचान भी हैं।
राष्ट्र निर्माण में भारतीय भाषाओं की अहम भूमिका
अमित शाह ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय भाषाओं ने राष्ट्र निर्माण और विकास की प्रक्रिया को आम लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिंदी सहित देश की विभिन्न भाषाओं ने जनजागरण, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में भूमिका निभाई।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि उनकी मातृभाषा गुजराती है, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोगों से सीधे संवाद स्थापित करने में हिंदी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनके मुताबिक, हिंदी ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को आपस में जोड़ने में एक प्रभावी संपर्क भाषा के रूप में काम किया है।
कई गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों ने हिंदी को बढ़ाया
गृह मंत्री ने हिंदी के विकास में गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों के योगदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी मातृभाषा गुजराती थी, लेकिन उन्होंने हिंदी में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसी महत्वपूर्ण रचना लिखी।
उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी ने वर्ष 1918 में दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। इसी तरह नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज में हिंदी को संवाद के माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया और ‘जय हिंद’ जैसे राष्ट्रवादी अभिवादन को लोकप्रिय बनाया।
भाषा को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति से जोड़ा
अमित शाह ने कहा कि देश को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने की दिशा में भाषा की भी अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें दैनिक जीवन, शिक्षा तथा प्रशासन में बढ़ावा देने से देश की अपनी सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वाभिमान केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की भाषा, संस्कृति, कानून और संस्थाओं में भी दिखाई देना चाहिए।
भारतीय कानूनों में बदलाव का भी किया जिक्र
गृह मंत्री ने पुराने औपनिवेशिक कानूनों की जगह नए भारतीय कानून लागू किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि यह बदलाव केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव की पुनर्स्थापना से जोड़ा।
उन्होंने राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे बदलाव देश की सोच और दृष्टिकोण में परिवर्तन को भी दर्शाते हैं।
14 सितंबर को मनाया जाता है हिंदी दिवस
हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1949 में संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। हिंदी दिवस के माध्यम से देश में हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं की विविधता, संरक्षण और सम्मान का संदेश दिया जाता है।
अमित शाह ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि हिंदी को आगे बढ़ाने का अर्थ दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे करना नहीं है। देश की सभी भाषाओं का सम्मान करते हुए अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना ही भारत की भाषाई विविधता को मजबूत करता है।
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