विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में गूगल का विशाल डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हब बनाया जा रहा है। करीब 15 अरब डॉलर यानी लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये की इस परियोजना को क्षेत्र में डिजिटल तकनीक और आर्थिक विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, निर्माण कार्य को लेकर पर्यावरण संरक्षण, जल संकट और स्थानीय लोगों की जमीन से जुड़े सवाल भी उठने लगे हैं।
तीन गांवों की 586 एकड़ जमीन पर बनेंगे डेटा सेंटर
राज्य सरकार ने परियोजना के लिए तीन गांवों की कुल 586 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई है। अदाविवरम-मुदासरलोवा क्षेत्र में निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। आरोप हैं कि परियोजना के लिए लगभग 160 एकड़ जंगल साफ किया गया और जमीन समतल करने के लिए पहाड़ियों को काटा गया। वन्यजीव अभयारण्य और जलाशय के नजदीक निर्माण होने के कारण पर्यावरण को संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई जा रही है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जमीन उनकी आजीविका का प्रमुख आधार रही है। कुछ किसानों ने जमीन आवंटन और उसके इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों की मांग है कि परियोजना से होने वाले लाभ के साथ-साथ उनके अधिकारों और पर्यावरणीय प्रभावों पर भी ध्यान दिया जाए।
पानी की खपत को लेकर गूगल ने क्या कहा?
डेटा सेंटर में सर्वर को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी और बिजली की जरूरत पड़ सकती है। इसी वजह से स्थानीय जलस्रोतों पर संभावित दबाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
गूगल की ओर से बताया गया है कि क्षेत्र में पानी की उपलब्धता और मौसम की परिस्थितियों का आकलन करने के बाद एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने का फैसला किया गया है। इस तकनीक से पारंपरिक लिक्विड-कूलिंग व्यवस्था की तुलना में पानी की जरूरत कम हो सकती है।
हालांकि, एयर-कूलिंग तकनीक अपनाने का मतलब यह नहीं है कि पूरे डेटा सेंटर परिसर में पानी की खपत पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। परियोजना के वास्तविक जल उपयोग और स्थानीय जलस्रोतों पर इसके प्रभाव का आकलन महत्वपूर्ण रहेगा।
पर्यावरणीय मंजूरी पर भी उठे सवाल
परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियों को चुनौती देते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने अदालत में मंजूरी से संबंधित अपना पक्ष रखा है। वहीं, परियोजना के संचालन के दौरान होने वाले पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्माण के दौरान प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, जल प्रबंधन और पर्यावरणीय नियमों का पालन किस तरह किया जाता है।
2028 तक शुरू हो सकता है संचालन
इस परियोजना में बड़े डेटा सेंटरों के साथ अंतरराष्ट्रीय समुद्री इंटरनेट केबल नेटवर्क से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी विकसित किया जाना है। निर्माण अप्रैल 2026 में शुरू होने की जानकारी दी गई है और कंपनी के अनुमान के मुताबिक, इसका संचालन 2028 तक शुरू हो सकता है।
परियोजना से स्थानीय स्तर पर रोजगार, निवेश और कारोबारी गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि, इससे कितने स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार मिलेगा और आसपास के गांवों को कितना प्रत्यक्ष लाभ होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी
विशाखापत्तनम में बन रहा डेटा सेंटर भारत के डिजिटल और AI क्षेत्र के विस्तार की दिशा में एक बड़ी परियोजना है। लेकिन इसके साथ जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय समुदायों के हितों की रक्षा करना भी जरूरी है। परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तकनीकी विकास के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों और ग्रामीणों की चिंताओं का समाधान किस तरह किया जाता है।
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