सुल्तानपुर के बल्दीराय क्षेत्र स्थित चक्कारीभीट गांव के छोटे इमामबाड़े में चौथी मुहर्रम की सुबह पहली मजलिस-ए-अज़ा का आयोजन किया गया। इस मजलिस को चेन्नई (तमिलनाडु) से आए मशहूर आलिम मौलाना मीर रियाज अली ने संबोधित किया। उन्होंने करबला के पैगाम, सब्र, वफादारी और इमाम हुसैन (अ.स.) के साथियों की कुर्बानियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। अपने संबोधन में मौलाना मीर रियाज अली ने जनाबे हुर (र.अ.) की इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति निष्ठा, तौबा और वफादारी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि करबला की घटना इंसानियत, हक और सच्चाई के लिए दी गई सबसे बड़ी कुर्बानी का प्रतीक है। मौलाना ने बताया कि जनाबे हुर शुरुआत में इमाम हुसैन (अ.स.) के रास्ते को रोकने वाली सेना के कमांडर थे।
हालांकि, जब सच्चाई उनके सामने आई, तो उन्होंने इमाम (अ.स.) के समक्ष अपनी गलती स्वीकार की और बिना किसी हिचकिचाहट के इमाम हुसैन (अ.स.) का साथ दिया। मौलाना ने जनाबे हुर (र.अ.) की शहादत, उनकी वफादारी, तौबा और अहलेबैत (अ.स.) के प्रति उनकी अकीदत का वर्णन किया। उन्होंने जोर दिया कि करबला का पैगाम आज भी लोगों को जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने, अपनी गलतियों को सुधारने और सच्चाई का साथ देने की प्रेरणा देता है। मजलिस के दौरान करबला के दर्दनाक दृश्यों का जिक्र सुनकर अज़ादार गमगीन हो गए और उनकी आंखें नम हो उठीं। मजलिस के समापन पर, अंजुमन करवाने अज़ा के साहिबे बयाज़ अंसार हुसैन ने नौहा पेश किया, जिस पर अज़ादारों ने पुरसा देते हुए मातम किया। नौहाखानी और मातम के साथ पूरे इमामबाड़े में गम-ए-हुसैन का माहौल बना रहा। बड़ी संख्या में मौजूद अज़ादारों ने इमाम हुसैन (अ.स.) और शोहदाए करबला को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। चौथी मुहर्रम की यह सुबह याद-ए-करबला, अकीदत और गम-ए-हुसैन से ओतप्रोत रही।





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