आसमान छूती कच्चे तेल की कीमतों ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां हर दिन नई चिंता लेकर आ रहा है. पेट्रोल और गैस के बढ़ते बिल ने सरकार की नींद उड़ा दी है. विदेशी मुद्रा भंडार पहले ही दबाव में हैं, व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है और जनता महंगाई की मार झेल रही है. ऐसे हालात में पाकिस्तान सरकार अब तेल संकट से बचने के लिए कई बड़े कदम उठाने में जुट गई है.
पाकिस्तान की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है. जैसे ही दुनिया में तेल महंगा होता है, उसका सीधा असर पाकिस्तान के खजाने पर पड़ता है. यही वजह है कि अब सरकार हर उस रास्ते को तलाश रही है, जिससे तेल आयात का बोझ कुछ कम किया जा सके. तेल संकट ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. सरकार अब ईंधन बचत, आयात नियंत्रण और खाड़ी देशों से राहत की कोशिशों में जुटी है. लेकिन बढ़ती महंगाई और व्यापार घाटा नई चिंता बन चुके हैं.

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क्या उपाय कर रहा पाकिस्तान?
सरकार ने सबसे पहले ईंधन खपत कम करने की कोशिश शुरू की है. सरकारी दफ्तरों में बिजली और ईंधन बचाने के निर्देश दिए गए हैं. कई विभागों में गैर जरूरी यात्राओं पर रोक लगाई गई है. ऊर्जा बचत अभियान को फिर तेज किया जा रहा है ताकि आयातित तेल की मांग कम हो सके.
इसके साथ ही पाकिस्तान अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तरफ तेजी से बढ़ने की कोशिश कर रहा है. सरकार सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है. जानकार कहते हैं कि अगर घरेलू बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ती है, तो आने वाले समय में तेल और गैस आयात पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है.
पाकिस्तान सरकार खाड़ी देशों के साथ नए ऊर्जा समझौतों की भी कोशिश कर रही है. सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से आसान भुगतान शर्तों पर तेल और गैस लेने की बातचीत जारी है. पाकिस्तान चाहता है कि उसे उधार या लंबी अवधि के भुगतान मॉडल पर ऊर्जा आपूर्ति मिलती रहे, ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर तत्काल दबाव कम हो सके.

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पाकिस्तान भी अपना रहा आयात नियंत्रण की नीति
इसी बीच सरकार घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाने की योजना पर भी काम कर रही है. नए गैस ब्लॉकों की खोज और पुराने ऊर्जा क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर तुरंत नहीं दिखेगा, क्योंकि पाकिस्तान की घरेलू ऊर्जा क्षमता सीमित है.
सरकार ने आयात नियंत्रण की नीति भी सख्त कर दी है. गैर जरूरी आयात पर नजर रखी जा रही है ताकि डॉलर की बचत हो सके. साथ ही उद्योगों को ऊर्जा दक्ष तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली कटौती और गैस आपूर्ति नियंत्रण जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं.
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी International Monetary Fund और दूसरे वैश्विक वित्तीय संस्थानों से भी लगातार संपर्क में है. सरकार कोशिश कर रही है कि नई वित्तीय मदद और राहत पैकेज के जरिए अर्थव्यवस्था को संभाला जा सके. लेकिन इसके बदले पाकिस्तान को कड़े आर्थिक सुधार और सब्सिडी कटौती जैसे फैसले भी लेने पड़ सकते हैं. हालांकि इन सभी कदमों के बावजूद हालात आसान नहीं दिख रहे. तेल की ऊंची कीमतें पाकिस्तान में महंगाई को और बढ़ा सकती हैं. परिवहन से लेकर बिजली उत्पादन तक हर क्षेत्र पर असर पड़ रहा है. आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ रहा है और उद्योगों की लागत भी तेजी से ऊपर जा रही है.
डगमगाती अर्थव्यवस्था को लग रहा झटके पर झटका
दरअसल यह वही संकट है जिसकी आहट पिछले कुछ महीनों से दिखाई दे रही थी. दुनिया के तेल बाजार में उठी हलचल ने पाकिस्तान की पहले से डगमगाती अर्थव्यवस्था को ऐसा झटका दिया है, जिसकी गूंज अब हर आर्थिक आंकड़े में सुनाई दे रही है. पेट्रोल और गैस की बढ़ती कीमतों ने पाकिस्तान के व्यापार घाटे को अप्रैल में 4.07 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया. यह वही पाकिस्तान है जो पहले ही विदेशी कर्ज, गिरते विदेशी मुद्रा भंडार और कमजोर औद्योगिक ढांचे से जूझ रहा था. अब महंगे ईंधन ने उसकी सांसें और भारी कर दी हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व का तनाव जल्दी खत्म नहीं हुआ, तो पाकिस्तान को और कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं. पेट्रोल की कीमतों में और बढ़ोतरी, बिजली दरों में इजाफा और सरकारी खर्च में कटौती जैसे कदम आने वाले दिनों में देखने को मिल सकते हैं.
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