इटली की सरकार ने स्कूलों को लेकर नए नियमों को मंजूरी दी है। इन नियमों के तहत स्कूलों में बुर्का और नकाब जैसे ऐसे कपड़ों पर रोक लगाई गई है, जिनसे पूरा चेहरा ढक जाता है। नियमों का उल्लंघन करने पर 1,000 यूरो यानी करीब 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। नाबालिग छात्र के मामले में जुर्माना उसके माता-पिता पर लगाया जा सकता है।
हालांकि, सिर और बाल ढकने वाले हिजाब को इस प्रतिबंध से बाहर रखा गया है। सरकार के मुताबिक, नए प्रावधानों का उद्देश्य स्कूलों में छात्रों के बीच संवाद और इटली की शिक्षा व्यवस्था में बेहतर एकीकरण को बढ़ावा देना है।
60 दिनों में संसद की मंजूरी जरूरी
नए नियम फिलहाल डिक्री-लॉ के रूप में लागू किए जाएंगे। इन्हें स्थायी कानून का रूप देने के लिए 60 दिनों के भीतर संसद की मंजूरी जरूरी होगी। इसके बाद ही ये प्रावधान स्थायी कानून के तौर पर लागू रह सकेंगे।
कुछ विदेशी छात्रों के लिए 30% की सीमा
नए नियमों में कुछ स्कूल कक्षाओं में ऐसे विदेशी छात्रों की संख्या 30% तक सीमित करने का प्रावधान भी है, जिन्हें इटली की भाषा या शिक्षा व्यवस्था का पर्याप्त अनुभव नहीं है।
प्राइमरी स्तर पर उन बच्चों को इस श्रेणी में रखा जाएगा, जो इटली में पैदा नहीं हुए हैं या जिन्होंने वहां की शिक्षा व्यवस्था में कम से कम दो साल प्री-स्कूल शिक्षा नहीं ली है। वहीं, सेकेंडरी स्कूलों में उन गैर-इटालियन छात्रों को इस गणना में शामिल किया जाएगा, जिन्होंने इटली की राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था में कम से कम तीन साल की पढ़ाई पूरी नहीं की है।
इटली में जन्मे बच्चों और वहां की शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त समय से पढ़ रहे छात्रों को इस 30% सीमा में शामिल नहीं किया जाएगा।
चेहरा ढकने को लेकर पहले से कानून
इटली में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा इस तरह ढकने को लेकर 1975 से कानून मौजूद है, जिससे व्यक्ति की पहचान छिप जाए। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में इसमें छूट का प्रावधान है।
2008 में एक अदालत के फैसले में धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से चेहरा ढकने के मामलों में परिस्थितियों को ध्यान में रखने की बात कही गई थी। अब स्कूलों के लिए प्रस्तावित नए नियम इसी मुद्दे को शिक्षा संस्थानों के स्तर पर अलग से संबोधित करते हैं।
यूरोप में पहले भी लागू हो चुके हैं ऐसे प्रतिबंध
यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स ने फ्रांस और बेल्जियम में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का और नकाब से जुड़े प्रतिबंधों पर फैसले दिए हैं। फ्रांस में 2014 और बेल्जियम में 2017 के फैसलों में सार्वजनिक जीवन में लोगों के बीच संवाद और मेलजोल से जुड़े तर्कों पर विचार किया गया था। दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की ओर से ऐसे प्रतिबंधों पर आपत्तियां भी जताई गई हैं।
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