भागलपुर। एक ओर जिला प्रशासन दावा कर रहा है कि रसोई गैस की आपूर्ति पूरी तरह सामान्य है और उपभोक्ताओं को केवल होम डिलीवरी के माध्यम से सिलिंडर उपलब्ध कराया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।
शनिवार को हबिबपुर स्थित एचपीसीएल के वितरक मौसम गैस एजेंसी में उपभोक्ताओं की लंबी कतार प्रशासनिक दावों की हकीकत बयां करती नजर आई। सुबह से ही पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग खाली सिलिंडर लेकर एजेंसी के बाहर कतार में खड़े रहे। कोई घंटों धूप में इंतजार करता दिखा तो कोई सिलिंडर खींचते हुए एजेंसी तक पहुंचा। स्थिति ऐसी रही कि लोगों को गैस मिलने की उम्मीद में अपनी बारी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा।

भागलपुर में रसोई गैस होम डिलीवरी के दावे फेल, सिलिंडर के लिए लगी लंबी कतारें (AI Generated Image)
जिला प्रशासन लगातार यह कहता आ रहा है कि उपभोक्ताओं को गैस एजेंसी या गोदाम पर नहीं आना पड़ेगा और शत-प्रतिशत होम डिलीवरी सुनिश्चित की गई है। इसके लिए अधिकारियों द्वारा नियमित निगरानी और आपूर्ति सामान्य होने का दावा भी किया जा रहा है, लेकिन शनिवार को मौसम गैस एजेंसी के बाहर लगी लंबी कतारों ने इन दावों की परतें खोल दीं। सवाल यह उठने लगा है कि यदि होम डिलीवरी व्यवस्था पूरी तरह लागू है तो फिर उपभोक्ताओं को सिलिंडर लेकर एजेंसी तक आने की नौबत क्यों पड़ रही है। आखिर किस मजबूरी में महिलाएं और बुजुर्ग घंटों लाइन में खड़े रहने को विवश हैं। विक्रमशिला सेतु बंद होने के बाद शहर में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति व्यवस्था पहले से ही दबाव में है। इसका असर रसोई गैस वितरण प्रणाली पर भी साफ दिखाई देने लगा है। परिवहन बाधित होने, वाहनों की कमी और मांग बढ़ने से उपभोक्ताओं की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। कई उपभोक्ताओं ने बताया कि समय पर होम डिलीवरी नहीं होने के कारण उन्हें खुद एजेंसी पहुंचना पड़ रहा है। कुछ लोगों का कहना था कि कई दिनों से बुकिंग लंबित है, जबकि घरों में गैस खत्म हो चुकी है। ऐसे में चूल्हा जलाने के लिए लाइन में लगना मजबूरी बन गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रशासनिक निर्देशों का पालन सख्ती से कराया जाता तो उपभोक्ताओं को इस तरह सड़कों पर कतार में खड़ा नहीं होना पड़ता। एजेंसी के बाहर की स्थिति यह संकेत दे रही थी कि आपूर्ति व्यवस्था अभी भी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट सकी है।रसोई गैस जैसी आवश्यक सेवा में अव्यवस्था ने आम लोगों की चिंता और नाराजगी दोनों बढ़ा दी है। अब लोगों की निगाहें प्रशासनिक दावों पर नहीं, बल्कि जमीन पर मिलने वाली राहत पर टिक गई हैं।
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