बॉलीवुड के दमदार और संजीदा अभिनेताओं में शुमार रणदीप हुड्डा आज 50 साल के हो गए हैं। 20 अगस्त 1976 को हरियाणा के रोहतक में जन्मे रणदीप ने अपनी जिंदगी में संघर्ष, असफलता और सफलता के कई दौर देखे। फिल्मों में आने से पहले ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई के दौरान उन्होंने बर्तन धोने, वेटर और टैक्सी ड्राइवर तक का काम किया। आर्थिक तंगी का दौर इतना मुश्किल था कि उन्होंने जिगोलो बनने की कोशिश तक की थी।
मुंबई लौटने के बाद थिएटर के जरिए उन्हें फिल्म ‘मानसून वेडिंग’ में पहला बड़ा मौका मिला। हालांकि शुरुआती दौर में उन्हें लंबे संघर्ष का सामना करना पड़ा। एक कॉन्ट्रैक्ट के कारण करीब चार साल तक उनके पास सीमित काम रहा। बाद में ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ ने उनके करियर को नई दिशा दी।
रणदीप अपनी एक्टिंग के साथ सामाजिक कार्यों के लिए भी जाने जाते हैं। केरल की बाढ़ के दौरान उन्होंने राहत शिविरों में लोगों के लिए खाना बांटा था। नासिक में सूखे के समय ग्रामीणों के लिए पानी के टैंकरों की व्यवस्था कराई। पंजाब और असम की बाढ़ के दौरान भी वे प्रभावित लोगों के बीच पहुंचकर राहत सामग्री बांटते नजर आए।
पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को लेकर भी रणदीप सक्रिय रहे हैं। मुंबई के वर्सोवा बीच की सफाई से लेकर पशु संरक्षण तक उन्होंने कई अभियानों में हिस्सा लिया। उनके इसी जुड़ाव के चलते उन्हें संयुक्त राष्ट्र के एक पर्यावरणीय अभियान से भी जोड़ा गया।
रणदीप अपने किरदारों के लिए कड़ी मेहनत करने के लिए भी मशहूर हैं। ‘हाईवे’ में भूमिका के लिए उन्होंने अपने लुक और शरीर पर काफी मेहनत की, जबकि ‘मैं और चार्ल्स’ में चार्ल्स शोभराज का किरदार निभाने के लिए उन्होंने नेपाल की जेल में उससे मुलाकात कर उसके हावभाव और व्यवहार को करीब से समझने की कोशिश की।
‘बैटल ऑफ सारागढ़ी’ उनके करियर का एक ऐसा प्रोजेक्ट रहा, जिससे वह भावनात्मक रूप से बेहद जुड़े थे। फिल्म के लिए उन्होंने लंबे समय तक बाल और दाढ़ी नहीं कटवाई, लेकिन प्रोडक्शन संबंधी समस्याओं के चलते फिल्म पूरी नहीं हो सकी।
रणदीप की जिंदगी यह बताती है कि मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद लगातार मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण इंसान को नई पहचान दिला सकता है। पर्दे पर अलग-अलग चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने वाले रणदीप आज अभिनय के साथ सामाजिक सरोकारों के लिए भी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं।
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