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चाय की दुकान से परिवार संभाल रहीं तीन बहनें, IAS-IPS बनने का सपना भी जारी; DM ने मदद का दिया भरोसा

गोरखपुर। परिवार की आर्थिक परेशानियों के बीच अपने सपनों को जिंदा रखने वाली तीन बहनों की कहानी अब प्रशासन तक पहुंच गई है। गोरखपुर में चाय की दुकान चलाकर पिता के इलाज और घर का खर्च संभाल रहीं वर्तिका, वंदिता और अवंतिका उपाध्याय से जिलाधिकारी दीपक मीणा ने फोन पर बातचीत की। उन्होंने परिवार की स्थिति और बीमार पिता का हाल जाना और बहनों को हर संभव मदद का भरोसा दिया। जिलाधिकारी ने तीनों बहनों को सोमवार सुबह अपने आवास पर मिलने के लिए बुलाया है।

तीनों बहनें दिनभर चाय की दुकान संभालती हैं और रात में पढ़ाई करती हैं। उनका लक्ष्य प्रशासनिक और पुलिस सेवाओं में जाना है। बड़ी बहन वर्तिका IAS बनकर प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती हैं, जबकि वंदिता IPS बनने का सपना देख रही हैं। अवंतिका भी IAS की तैयारी कर रही हैं।

पिता के पैरालाइज होने के बाद बिगड़ी परिवार की आर्थिक स्थिति

महराजगंज की रहने वाली तीनों बहनें वर्तमान में गोरखपुर के बरगदवा क्षेत्र में किराए के मकान में परिवार के साथ रहती हैं। उनके पिता रामसकल उपाध्याय पहले एक निजी बीमा कंपनी में ब्रांच मैनेजर के पद पर काम करते थे। वर्ष 2017 में पैरालाइज होने के बाद उनकी नौकरी चली गई। इसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई।

मां माधुरी गृहिणी हैं। परिवार की आमदनी का कोई स्थायी साधन नहीं होने के कारण घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और पिता के इलाज का बोझ बढ़ता गया।

ट्यूशन और नौकरी से भी पूरा नहीं हुआ खर्च

परिवार की मदद के लिए वंदिता ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने कुछ समय छोटी-मोटी नौकरी भी की, लेकिन इससे घर का खर्च और पिता की दवाइयों का खर्च पूरा नहीं हो सका।

करीब चार साल पहले तीनों बहनों ने चाय का स्टॉल लगाने का विचार बनाया था, लेकिन उस समय परिवार और रिश्तेदारों की प्रतिक्रिया को लेकर उनकी मां ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। बाद में आर्थिक स्थिति और खराब होने पर बहनों ने दोबारा इस योजना पर काम शुरू किया।

8 हजार रुपये से शुरू किया चाय का स्टॉल

करीब चार महीने पहले तीनों बहनों ने अपनी बचत से 8 हजार रुपये जुटाए और दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के गेट के सामने चाय का स्टॉल शुरू किया। उन्होंने अपनी दुकान का नाम ‘बिलीवर बिस्ट्रो’ रखा।

शुरुआत में उन्हें अपने ही कॉलेज के आसपास चाय बेचने में झिझक महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे लोगों का सहयोग मिलने लगा। ग्राहकों की संख्या बढ़ी तो उन्होंने चाय के साथ मैगी भी बेचनी शुरू कर दी।

दिनभर दुकान, रात में पढ़ाई

तीनों बहनों के लिए दुकान चलाना सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि परिवार को संभालने की मजबूरी भी है। दिनभर दुकान पर रहने के बावजूद वे पढ़ाई नहीं छोड़ना चाहतीं। दुकान बंद करने के बाद रात में करीब 12 बजे से 2 बजे तक पढ़ाई करती हैं।

वर्तिका प्रशासनिक सेवा में जाकर अधिकारी बनना चाहती हैं। वंदिता का लक्ष्य IPS बनना है, जबकि अवंतिका भी IAS बनने की तैयारी कर रही हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद तीनों बहनें सेल्फ स्टडी के जरिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं।

पिता के इलाज में अब तक लाखों रुपये खर्च

वंदिता के मुताबिक, पिता के इलाज में अब तक करीब 3 से 4 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। उनकी दवाइयों पर हर महीने लगभग 5 से 6 हजार रुपये खर्च होते हैं। बेहतर इलाज की उम्मीद में परिवार उन्हें नेपाल भी ले गया था, लेकिन इलाज के दौरान जमा पूंजी खत्म हो गई।

परिवार के पास गांव में कुछ जमीन है, लेकिन उससे नियमित आमदनी नहीं होती। ऐसे में तीनों बहनों की चाय की दुकान परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रही है।

मां बोलीं- बेटियों ने मुश्किल समय में परिवार को संभाला

मां माधुरी का कहना है कि उन्हें अपनी बेटियों पर गर्व है। शुरुआत में उन्हें डर था कि रिश्तेदार और समाज क्या कहेंगे, लेकिन अब उन्हें अपनी बेटियों के फैसले पर खुशी है।

उनका कहना है कि मुश्किल समय में बेटियों ने परिवार की जिम्मेदारी उठाई और अपने सपनों को भी नहीं छोड़ा। पिता रामसकल भी अपनी बेटियों की मेहनत से बेहद खुश हैं।

DM के फोन से बढ़ी मदद की उम्मीद

तीनों बहनों की संघर्ष की कहानी सामने आने के बाद जिलाधिकारी दीपक मीणा ने उनसे फोन पर बात की। उन्होंने परिवार की परिस्थितियों को समझने के साथ पिता के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली। DM ने बहनों को भरोसा दिलाया कि प्रशासन की ओर से हर संभव मदद की जाएगी और उन्हें अपने आवास पर मुलाकात के लिए बुलाया है।

अब तीनों बहनों को उम्मीद है कि प्रशासन की मदद से पिता के इलाज और पढ़ाई से जुड़ी परेशानियां कुछ कम होंगी। आर्थिक चुनौतियों के बीच वे चाय की दुकान चलाने के साथ अपने IAS और IPS बनने के सपने को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत कर रही हैं।

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