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छत्तीसगढ़ के पूर्व CM अजीत जोगी के बेटे की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में एक अहम कानूनी मोड़ आया है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनकी उम्रकैद की सजा पर अंतरिम रोक लगा दी है और हाईकोर्ट द्वारा दिए गए सरेंडर के आदेश को भी फिलहाल स्थगित कर दिया है। इस फैसले ने करीब 23 साल पुराने इस हाई-प्रोफाइल केस को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत, CBI से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने अमित जोगी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की। कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से इस मामले में जवाब मांगा है और अगली सुनवाई तक जोगी को सरेंडर करने से छूट दे दी है।
अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट में दो आदेशों को चुनौती दी थी- पहला CBI को अपील करने की अनुमति और दूसरा हाईकोर्ट का वह फैसला जिसमें उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। अब दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई की जा रही है, जिससे केस की दिशा तय होने की संभावना है।

हाईकोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा

इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 6 अप्रैल 2026 को अमित जोगी को IPC की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई और तीन हफ्ते के अंदर सरेंडर करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा था कि, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अमित जोगी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

क्या है रामावतार जग्गी हत्याकांड?

यह मामला 4 जून 2003 का है, जब रायपुर में NCP नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जग्गी उस समय छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक प्रभावशाली नाम थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। हत्या के बाद यह मामला काफी चर्चित हो गया और इसकी जांच CBI को सौंपी गई। जांच एजेंसी ने अमित जोगी समेत कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया और विस्तृत चार्जशीट दाखिल की।

2003 से 2026 तक लंबी कानूनी लड़ाई

इस केस की कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल रही है। 2007 में विशेष CBI कोर्ट ने 28 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई, लेकिन सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया गया।

इसके बाद मृतक के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए हाईकोर्ट भेज दिया। करीब दो दशक बाद, 2026 में हाईकोर्ट ने 11,000 पन्नों की चार्जशीट और सबूतों पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और अमित जोगी को दोषी ठहराया।

हाईकोर्ट का तर्क- बिना जानकारी वारदात संभव नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह मानना तर्कसंगत नहीं है कि, अन्य आरोपी इतनी बड़ी साजिश को बिना अमित जोगी की जानकारी के अंजाम दे सकते थे। अदालत ने यह भी कहा कि जिस साक्ष्य के आधार पर अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया गया, उसी आधार पर अमित जोगी को बरी करना उचित नहीं था। इसीलिए उन्हें इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड मानते हुए दोषी करार दिया गया।

अमित जोगी बोले- मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा

सुप्रीम कोर्ट में राहत मिलने के बाद अमित जोगी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। उन्होंने अपनी कानूनी टीम का आभार जताते हुए उम्मीद जताई कि उन्हें न्याय मिलेगा। इससे पहले भी उन्होंने कहा था कि, हाईकोर्ट ने उनका पक्ष पूरी तरह सुने बिना ही फैसला सुनाया, जिससे उन्हें न्याय नहीं मिला।

CBI और पीड़ित पक्ष के आरोप

CBI ने अपनी जांच में अमित जोगी को इस हत्याकांड का मुख्य साजिशकर्ता बताया था। वहीं पीड़ित पक्ष ने भी आरोप लगाया कि यह हत्या एक सुनियोजित साजिश थी, जिसमें तत्कालीन सत्ता का प्रभाव शामिल था। पीड़ित पक्ष के वकील ने अदालत में दलील दी थी कि इस तरह के मामलों में केवल प्रत्यक्ष सबूत ही नहीं, बल्कि पूरी साजिश को समझना जरूरी होता है।

इस हत्याकांड में कई अन्य आरोपियों को भी दोषी ठहराया गया था। इनमें पुलिस अधिकारी, स्थानीय नेता और कथित शूटर शामिल थे। दो तत्कालीन CSP, एक थाना प्रभारी और अन्य कई लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। यह मामला इसलिए भी चर्चित रहा क्योंकि इसमें राजनीति, प्रशासन और अपराध का कथित गठजोड़ सामने आया था।

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