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SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “चुनाव आयोग मनमानी नहीं कर सकता”, नाम कटने वालों को राहत के संकेत

बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाने के साथ एक बड़े सवाल का जवाब भी साफ कर दिया है. सवाल यह कि अगर किसी व्यक्ति का नाम SIR के दौरान वोटर लिस्ट से हट जाता है, तो उसके बाद क्या होगा? मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत (CJI Surya Kant) और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने साफ कहा कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम फैसला नहीं कर सकता. यानी केवल SIR के आधार पर किसी को ‘गैर-नागरिक’ नहीं माना जाएगा. अगर किसी व्यक्ति के दस्तावेज संदिग्ध पाए जाते हैं और उसका नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है, तब भी यह फैसला अंतिम नहीं होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की भूमिका सिर्फ मतदाता सूची तैयार करने और उसकी समीक्षा तक सीमित है, नागरिकता तय करना उसका काम नहीं है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए जाएंगे, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय को भेजना होगा. इसके बाद केंद्र सरकार तय प्रक्रिया के तहत विस्तृत जांच करेगी और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने के लिए की गई नागरिकता संबंधी जांच केवल प्रारंभिक और सीमित प्रकृति की होगी. इसे किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त करने का आधार नहीं माना जा सकता. अदालत ने साफ कहा कि आयोग का फैसला न तो अंतिम होगा और न ही उससे किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकार स्वतः खत्म हो जाएंगे.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बिहार SIR पर फैसला सुनाते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं और मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है. अदालत ने माना कि बिहार में जनसंख्या परिवर्तन, बड़े पैमाने पर पलायन और शहरीकरण जैसे कारणों से मतदाता सूची में व्यापक बदलाव आए हैं, इसलिए चुनाव आयोग का SIR कराने का फैसला वैध उद्देश्य पर आधारित था. हालांकि, कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि इस प्रक्रिया में किसी नागरिक के अधिकारों का हनन न हो. अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपने पुराने पते से कहीं और चला गया है, तब भी उसके पुराने रिकॉर्ड और परिवार के आधार पर उसकी पहचान की जांच की जा सकती है. केवल दस्तावेजों में कमी होने भर से किसी को स्थायी रूप से मतदाता अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.
पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि SIR के जरिए चुनाव आयोग नागरिकता तय करने की कोशिश कर रहा है. कोर्ट ने कहा कि आयोग केवल मतदाता सूची की प्रामाणिकता सुनिश्चित कर रहा है, जबकि अंतिम नागरिकता निर्धारण केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर बिहार में SIR प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, वहीं दूसरी ओर उन लोगों के लिए भी राहत का रास्ता खुला रखा जिनके नाम जांच के दौरान वोटर लिस्ट से हट सकते हैं. अदालत ने साफ कर दिया कि नाम कटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है और हर व्यक्ति को अपनी नागरिकता साबित करने का पूरा कानूनी अवसर मिलेगा.

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